________________ 532 श्री पुष्करमुनि अभिनन्दन ग्रन्थ : पंचम खण्ड RE भगवतीशतक 15 100 उपासकदशांग अ०६ व 7 101 आवश्यक नियुक्ति 474 से 478 102 आवश्यकचूणि प्रथम भाग, पत्र 283-287 103 आवश्यक हारिभद्रियावृत्ति, पृ० 206 104 आवश्यक मलयगिरिवृत्ति पूर्व भाग, पत्र सं 277 से 278 105 महावीरचरियं 6-194 से 106 त्रिषष्टिशलाका पुरुष चरित्र पर्व-१ 107 अशोक के धर्मलेख-जनार्दन भट्ट-पब्लिकेशन्स डिविजन, दिल्ली 1657, पृ० 401-403 108 उत्तर हिन्दुस्तान मां जैन धर्म, चिमनलाल जयचन्द शाह-लांग मैन्स एण्ड कं०, लन्दन, 1630, पृ०६४ 106 दर्शन और चिन्तन-गुजराती भाग 2, पं० सुखलाल जी संघवी, पृ० 1021 110 उपासकदशा का अनुवाद, प्रो० होर्नले, भाग 2, परिशिष्ट, पृ० 23 111 दर्शन अने चिन्तन, भाग 2, पृ० 1022 112 ऋग्वेद 113416% 1, 6 / 583 10 / 16635; 16187; 11543 113 (क) योग आत्मा -तैत्तिरीय उपनिषद 214 (ख) तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रिय धारणाम् / अप्रमत्तस्तदा भवति योगे हि प्रभवाप्ययो॥ -कठोपनिषद 2 / 6 / 11 (ग) तत्कारणं सांख्ययोगाधिगम्यं ज्ञात्वादेवं मुच्यते सर्वपार्शः॥ -श्वेताश्वतर उप०६।१३ (घ) अध्यात्म योगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्ष शोको जहाति / -कठोपनिषद् 1 / 2 / 12 114 महाभारत में 24, 25 एवं 26 तत्त्व मानने वाली सांख्य परम्परा का वर्णन है। 115 गीता 4 / 28, 313-4; 16-7; 6 / 17-23-26 664-6, 8 / 10-2, गीता रहस्य माग 2 की शब्द सूची देखें। 116 (क) सूत्रकृताङ्ग 16 / 3 (ख) उत्तराध्ययन 8 / 14; 11114 117 मोक्षेण योजनादेव योगोपत्र निरुच्यते / लक्षणं तेन तन्मुख्यहेतुव्यापारतास्य तु // -योगलक्षण द्वात्रिंशिका / (ख) मोक्षेण योजनाद् योगः एष श्रेष्ठो यथोत्तरम् / -योगबिन्दु 31, हरिभद्र 118 युजपी योगे, गण-७ हेमचन्द्र धातुपाठ 116 युजिच समाधौ, गण-४, हेमचन्द्र धातुपाठ 120 योगलक्षण द्वात्रिशिका 10,16 121 योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः / -पातंजल योगसूत्र पा-१, स-२ 122 अपुनर्बन्धद्वात्रिशिका-१४ 123 पातंजल योग-दर्शन पाद 1, सूत्र 17-18 124 योगभेदद्वात्रिंशिका-१ 125 पातंजल योग दर्शन पाद 1, सूत्र 12, 15 और 16 126 विषय दोष-दर्शनजनित भयातधर्म संन्यासलक्षणं प्रथमम् स तत्त्वचिन्तया विषयौदासीन्येन जनितं द्वितीया पूर्व करणमावितात्त्विक-धर्मसंन्यास लक्षणं द्वितीयं वैराग्यं यत्र क्षायोपशमिका धर्मा अपि क्षीयन्ते क्षायिकाश्चोत्पद्यन्त इत्यस्माकं सिद्धान्तः // " -श्री यशोविजयजी कृत पातंजल-दर्शनवृत्ति, पाद 10, सूत्र 16 127 संप्रज्ञातोऽवतरित, ध्यानभेदोऽत्र तत्वतः / तात्त्विकी च समापत्ति त्मनो भाव्यता विना // 15 // 'असम्प्रज्ञातनामा तु, संमतो वृत्तिसंक्षयः / सर्वतोऽस्मादकरणनियमः पापगोचरः // 21 // -योगावतार द्वात्रिशिका Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org