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________________ सप्ततिका. जलपूरिहिं खिबाइ हा नरिंद, पुकरातत्य श्य खोयविंद। धावह धाघहजो सुहम इत्य, कर नरवजगिसोसमस्था॥१२॥ जिहिंदीसदीहतमाखसाख, निर्वबजवुतम्बर विसाखाह दीहतमाखामवीयरुरिक, तरणी विलग्ग कह कह बि रुस्किा॥१३॥ उत्तरिय चमिवासव जवेण, संजुत्तन कश्चश्परियरेण । वीसमकखए तिहिं नरेस, नियनयणिहिं पिठवणपएस ॥१४॥ श्रासमधरम अगमषग्य, हरिहरिणजूद उन्नखई सिग्घ । जमरुष समिर तिहिंजूमिनाह, श्राप उधेय महा श्रगाह॥१५॥ मणिरुप्पकणयटकय अपार, तारय जिम जिगमिग करईतार । कूखंकससलिखुरकणिय ताव,निहि पिरकश्रयणुझाउसहाव॥१६॥ तं पिस्किय नियमंदिरिहिं पत्त, निवकित्ति परिवारजुत्त । श्रह चिंत सरखसहाव राय, वंचिचाइ श्रवसरिनेवनाय॥१७॥ ॥धात ।। दस स नरवर नियय सहोयर समरविजय.माणे विखहु । अश्कुभिखसहाविण चिंतइ तस्कण सो पावि सुदु बहु ॥ १७ ॥ जास ॥रयणखोहेण निहणेमि नणु जायर, जीववहाखियषषपावजरकाररं । रकमवि खेमि गयतुरयसयसजिय, गुरुचजुयदंगसारेण जे अभियं ॥१५॥ कस्स माया पिया जाय जत्तिबाया, कस्स मित्ता य जयणी य परपुत्तया। जस्स घमा तस्स पण सयणसंबंधिणो, पिम्ममावडर सबो विनणु परियो॥१०॥ मुकनिस्संकचित्तेव बहुजाणा, पाय नियनायहप्पणत्यमुरुमाश्या । १ मतिमायाविना 38 ॥१ ॥
SR No.090458
Book TitleUpdeshsaptatika
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages498
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Sermon
File Size13 MB
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