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________________ 30 श्राखोड्सु अद्यातणं असणं तुझेहिं चैव सममयं । श्रहिंकि किमालोएम गुरूहिं समुझषियं ॥ १० ॥ तुम घाईपिको उत्तो तो सो कई पुस्सीसो । सुडुमाई पर विद्दाई पिसि नो अप्पणिका ॥ १९ ॥ कंपि न खोयस्स खोयां जेण नियइ नियदोसे । परदोस पिणे पुण खोयखखरकाएं जयंति ॥ २० ॥ एक वीमंसंतो गर्छ कुमीरंतियं कुसीसो सो । इत्यंतरे सरी गुरु ॥ ११ ॥ तदसावे मुलि छाए तस्स सिरकवणहेचं । संजाय अरचे वेटवियर्मघयारतरं ॥ ३२ ॥ नई पसरिया तकाखं मारु खरो जाउं । ककररेणुखाखपरायो तस्स सी सुवरिं ॥ २३ ॥ जी बाहर गुरु पत्थरखंमेहिं आणितो । एहि इदं श्रायरिया जहंति जो बच करुणाए ॥ २४ ॥ वार नामीसिं पेठामि पहुं महंधयारजरे । तो तेहिं करंगुनिया आमुसिकाएं समुद्रविया ॥ २५ ॥ दीवकखियच तो सा सहसा पखितमिह समादत्ता । चकोर्ट संजाल तो फुस्सेहो विमंसेइ ॥ २६ ॥ एस चवस्सयमने सुगुप्तयं दीवयंपि रस्के । वचो श्रमरी रुघा तं पुढं तचिं लग्गा ॥ २७ ॥ निम्मका अक्षर विषीय निकि धि पावि । गुरुद्विद्दाणि पलोइसि न डु खसि नियगुरूहि तो ॥ २० ॥ माहिं तो तं वियत्तफलं खु पाविहिसि । श्य बुद्धं निठुरदंकरण सो तामिल सीसे ॥ २९ ॥ सो सो जयजीयमणो निवकिय चक्षणेसु सूरिपायाएं । सुखो को खामे नवरि नामेइ नियसीसं ॥ ३० ॥ मिठामि दुध देइ खेइ तस्सेच सरक्षमचंतं । न पुसो एवं काई परिवार सुगुरुपयजर्त्ति ॥ ३१ ॥
SR No.090458
Book TitleUpdeshsaptatika
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages498
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Sermon
File Size13 MB
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