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________________ 4- 06110-- Mगुरुणो निदिकंते सुणिकम् इरिसमावइ मुगुणं । पिरकंताण वि अम्हाण जेण निसियो न मणयम्मि ॥२२॥ तो को |सि पनास किमहं ढंकेमि लोयवयणाई। सिन्बाइ वाश्णो जणगणा य को मन अवराहो ।। २३ ॥ श्य जाव इकिया। हवासण साणाव ते पलाणा तो। वयणं अजपमाणा माणावगमा विखरकमुहा ॥ २ ॥ पुणरवि धिक्रम्मा सो तहेव साहूण निंदमायर । कोसियगो पुण तप्पुहिपूर अग्गी वाल व ॥१५॥ विक्राहरजुयखमहो समुवेयं अंबरम्मि चरहै माणं । जिणसादुन्नत्तिरंगिहमाणसं धम्मसघाए ॥ १६ ॥ विजाहरी वुत्तं पिरकसु कहमेस निंदई मुणियो । ता सिरक वेहि सासुमेव देवसामा पमिक क ।। ५५ ॥ विआइसएण त सोलस जप्पाश्या महारोगा । धिजाणो सरीरे दोन्नि तहा कोसियस्सावि ॥ २७ ॥ सासो जरो य तेहिं रोगायंकेहिं पीमियंगातो । जीवित्ता चिरकाख मरिलं पढमं गया नरय। ॥श्ए ॥ जमिही आपतकालं सोमम गरुयपुस्कविदुरंगो । वयणामयदोमिक्षो साहूणमवमवाएण ॥ ३० ॥ श्यरो वि" बालमिय सुचिरं नवन्नवं सदिय मुस्कसंजारं । मुसहवाही होही कहं वि किल्लेण कम्मवसा ॥ ३१ ॥ इय जो मुणीण निंद। कुण तहऽनो सुणेहि किक्रांति । ते दोन्नि वि संसारे सुस्किया इंति अञ्चतं ॥ ३२॥ केवखमिह जो निमुणइ वारश नहु संतियाइ सत्तीए । सो कोसिय किर सुनहबोहि जायइन संदेहो ॥ ३३ ॥ ॥ इति साधुजनावर्षवादफखसूचकं ज्ञातम् ।। 385 hot-warr%20%
SR No.090458
Book TitleUpdeshsaptatika
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages498
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Sermon
File Size13 MB
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