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________________ H ATRA *% * * * ** %**** घह सोविए पुदईसो पुरखोयं जापिड विरत्तमाएं । एवं मम्मि काय विकायग्गीव निप्पइ ॥१२॥ रडामवर्क खु मं कोसनमतुझसखतुझं मे । जाई मई य हीणा दीपायारो जङ जा ॥ १३ ॥ खोएहिं सरिकर्ड तह सुखसोहि मुक्कमलाई । मक विवेयवियारा घणुव वारण खलु नका ॥ १२॥ सवाणोनही जलेहिं अग्गीय जहिंधणेहि य धणेहिं । श्रप्पा तहा न तुस्सा जुत्तेहिंदि रिजोएहिं ॥१५५ ।। जीए सेवारसिउँ वसि नरूपेमयम्मि इब्नसुने । कुखमुकित्ता विमलं तीए पुण ही अहं खुको ॥ ११६ ॥ दीवे जहा पयंगो मज्जे जासस्स जइ महामयरो। तह निवमिऽमि अयं नमी कजाम्मि जवकूवे ॥१२॥ श्य सोहणम्मि काणे वटुंतो जावर्ड जश्व नियो । आरुहिय खवगसेणि केवखवली सो वरिट ॥ १२ ॥ तसिं नापधराएं चलन्दमवि नियमवचिदेवेहिं । विहिया केवलिमहिमा समप्पिङ साहुवेसोय ॥१३॥ अहह अहो अहरियं पस्सह रागरोसदोसिक्षा । चठरोऽवि चउरमणों जाया वेरग्गरंगिक्षा ।। १३०॥ सर्वेऽवि पणमिया ते सुरेदि खयरेहिं नायरजणेहिं । कंचएपलमारूदा सोईता रायइंसुख ॥ १३१॥ शह य श्वासुयनाणी माणी मण्यपि नेव मणमज्के । अधरियजूयचरिय निययं कहिलं समाढत्तो ॥ १३ ॥ पुषजवेऽहं समापो श्रासी वासीइ चंदणे तुक्षो। नजाऽपि दु पचनासका जाया सुनिम्माया ॥ १३३ ॥ तं पिठंतस्स सया रागो मह माणसे समुसि । तमणासोश्य सम्म संपत्ते जीवियतेऽवि ॥ १३४॥ घेमापियदेव पच्चो सा साहुणीवि खलु तसो । जाश्मउम्मचमई संपला सोयधम्मरया ॥ १३५॥ L-AE % 199
SR No.090458
Book TitleUpdeshsaptatika
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages498
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Sermon
File Size13 MB
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