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________________ परिसपमायठाणा जेसु कं ते हवंति नए समझा । इमुह तुझा एए बकायनिम्मा ॥ ६५ ॥ हवा एएहिंतो नूपोऽविदु सग्गुणो न जस्सत्थि । सुदुमोऽवि नियमनंगो एए पुष सजदा वक्ता ॥ ६३ ॥ eadहिं इमेहिं दिहिं नियम सुदिधीए । सरमाणो जिणवयणं को एसिं बंद कुखा ॥ ६४ ॥ नं च संगमो न इमेसिमम्हा विष्पसादेइ । सावयधम्मरयावि सिढिखचं चरणकरणेसु ॥ ६५ ॥ हिंकामो जेणं जवावीए श्रईव वियमाए । इय श्रणुसिकोऽवि हु नायखेण विविहाहिं जुसीहिं ॥ ६६ ॥ मई पलवे इमं तमवस्समम्द मेएहिं । गहियचा पचका निरवका वह मए एत् ॥ ६७ ॥ तुलसि जं पुण तं कार्ड कोऽवि किर न सके । ता मुयसु मह करं तुह न बलकारो करेयबो ॥ ६० ॥ एए वयंति दूरं मह तयं इमेहि खलु सद्धिं । तो नायले जलियं न गमास्स तुह जदं ॥ ६ए ॥ हियमहियं कमि तुइ जं दियं तमायरसु । दुरकाकरोमि नाहं को कस्स करिक किर वयणं ॥ ७० ॥ न वि तरसंगार्ड विविहोवाएहिं वारिवि तु सो । चंदामुज्जिय कुहियं पयाड़ नछु मन्त्रिया वा ॥ ११ ॥ गोयम स मंदजग्गो पर्छ साहुपासपासम्म | लग्गा य पंचमासा वचंताणं पड़े ताणं ॥ १२ ॥ अह अन्नया घासवहरि ग य दुब्जिको । निरकायरावि निरकं न तत्थ पार्वति मणयपि ॥ ७३ ॥ पमिकतालीयपाचा कालदोसर्ज मरिजं । विमला न ते समता श्रमणा जिलधम्मसेवाए ॥ १४ ॥ १ साधुपाश पार्श्वे. 160
SR No.090458
Book TitleUpdeshsaptatika
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages498
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Sermon
File Size13 MB
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