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________________ उपदेश. || 00 || जो सुभ पिठ व मुतयमस्थि बीयमेयस्स । हियपरिग्गदधरशेोस घुवं ताव पुस्सीखो ॥ ४० ॥ परिमियपरिग्गदेहिं होयवं निचमेव साहूहिं । इमव मन्त्रिय मरतवयणममयव मरयरं ॥ ४९ ॥ नायममुखा खु एवं अइ एगा पुत्तिया गमिस्सर मे । होहामि ता कदमहं ईसिं गपि न वयजंगो ॥ २० ॥ कविगणा इव रूतलहिं । सुचिरं निष्काश्य खोयदि नालोइयमले ॥ ५१ ॥ एएस संपयं चि (त) य तह सोया नियेण इत्थे । गहि श्रन्निवारो सारो गमि चरितस्त ॥ २२ ॥ तुमए दिमिपि हुकलं सूरोद अजाएऽवि । जो जग्गई दिसो वच्चामो तुरियमुछेह ॥ ५३ ॥ एपि ताव से हो तो ज्याषी श्रणुवत्तो ॥ ५४ ॥ बिए फुसिएवि कप्पग्गणं कथं न एएए। तहय पजाए मग्गे कप्परगेणं च हरियतां ॥ ५५ ॥ निस्संकं संघट्टियमशेष सीउदगंपि परिजुतं । पवणस्सवि संजाया विरादया मुझभावेण ॥ ५६ ॥ पायजुयं मयि संकमिट एस खारथंमिनं । पद्मविनेश जर्ज जयणा करस्यवहिं गंतुं ॥ ५७ ॥ इरिया परिक्रमणं निद्दि जीयकप्पसुत्तम्मि । तब चिधियबे सइयवे श्रासियवे य ॥ ५८ ॥ तह चैव वट्टियां क्कायजियास न हु जहा थाहा । पश्यामिमेसि चरितलेसोऽवि न तु दियो ॥ ५९ ॥ मुहांत गप मिले कुष्माणो श्रविदिया पुणो अज । सो चोइट मए जो साडु कई कुसि परिखेदं ॥ ६० ॥ फरुफरुसद्देश पके बिराढ्णं वाटणो न हु गऐसि । कमणुवचचित्तो परमत्यपसाङ्गो होसि १ ॥ ६१ ॥ 160 सप्ततिका. ||do||
SR No.090458
Book TitleUpdeshsaptatika
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages498
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Sermon
File Size13 MB
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