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________________ उपदेश ॥ ८१ ॥ चवना गयपुन्ना जूयपिसायाण जरकररकाएं । श्रही पाहते तऽवि चविऊण मिष्ठकुले || ७५ स कुणिमाहारं नुंजिय असुहज्जबसाहट तर्ज मरिठं । सप्तमनरयम्मि गया गयाहया पुरकसम दिग़या ॥ ७६ ॥ तत्तो उघट्टित्ता इत्तो चत्री सिगाई तझ्याए । सम्मत्तमुत्तमं ते बहितु सुस्सावयकुलेसु ॥ 99 ॥ तत्तो यम्मि जवे चउरो न सिज्जिहति ते मुलियो । सिकिस्सर न हु एगो पंचम ताए जो जेो ॥ 30 ॥ एतमिदि जल जई सो तहा अजबो य । जबो हव छाबो ! जयवं मह कहसु सो सुमई ॥ ७ए ॥ गोयम जो जइ एस तारिखो तो मर्ज समायो य । उप्पन्नो कट्सु कहिं गोयम परमादमियगेसु ॥ ८० ॥ जयवं किं वा परमादम्मियगई खु संजवइ । एवमियं जे पुरिसा समझरा दोसरोसिला ॥ ८१ ॥ मिचदपणं हि संधि कहियमेरिसयं । अवगणिय बारसंग सुनाएं सुकयगुणठाणं ॥ ८२ ॥ मुयि समयसरूवं निचमणायारसंसणं काळं । चचप्पियं तमेव य जहा सुमइषा कुसीखा ॥ ८३ ॥ एगंतपरकवार्ड कर्ज जर्ज होइ जूरिजवजमणं । एएऽवि जइ कुसीला ता न सुसीखो जए कोऽवि ॥ ८४ ॥ गात दिरका पासे एएसिमेस मह नियमो । निब्बुधि जड़ा तं तदा धुवं सोऽवि तित्थयरो ॥ ४५ ॥ इममुच्चरमाणे महानिमाण सुमरणा तेण । बऊं चिकणकम्मं धम्मंमि पर मुदत्ता ॥ ०६ ॥ कम यिमा पला सिलाइ सिढिलमुखिपासे । परमाम्मियनिकरगई गर्ल श्वयि ततोऽषि ॥ १ ॥ १ राता- 162 सप्ततिका, 11 03 01
SR No.090458
Book TitleUpdeshsaptatika
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages498
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Sermon
File Size13 MB
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