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________________ ताणं गुणरयणनिहीए सयणमित्ताण सुरककारीण । न पहुष्पंति मणोरहमालाई अविसाला ॥७॥ श्राहियमहिमा न चेइएसुं न देवपूया । साइम्मियवन का सामत्थमवि नस्थि ॥ ७ ॥ तो तेहिं सखगेहिं विचिंतिय निघणेहि हिययम्मि । जाव सधषो मणुस्सो पसंसणिको जाणे ताव ॥॥ सबोऽवि पासवत्ती संपला संपया घरे जाव । वुचोदयं घणंपि दु विकुलिया नणु परिचय॥१०॥ गम्मइ तत्थ विदेसे सहवासी जत्थ दीसए न जणो । न दु देसिकाइ वयणं सयणाणं निझात्तम्मि ॥ ११ ॥ दूरगयाराहार पुशि मदोरहा कश्यादि । तदलावे पधडा पाविजा मुरकसुरककरी॥१॥ श्य परिज्ञाविय दोहिवि कमागयं नयरमुन्कियं सहसा । जो जम्मि विरयचित्तो सो तम्हा दूर जाइ ॥ १३ ॥ कश्वदिपळते मग्गे बच्चंतयाण नणु ताएं । सावयसहिया मिलिया अणगारा पंच सायारा ॥ १४ ॥ तो नाइलो पर्यपश्तं पड़ जो सुमइ एस मुणिसत्यो । बट्टा अश्मछुतरो एएण समं पवच्चामो ॥ १५॥ तेण वि तहत्ति नणिए मिलिया सत्यम्मि लाजणो दोऽधि । जा जंतेगपयाणगमेए ता नाश्तो नए ॥ १६ ॥ जो जद्द सुणसु हरिवंसतित्यसिरिनेमिनाहजिणपहुणो। मुहकमला निसुणियमिमं मए सुहनिसनेणं ॥ १७ ॥ एरिसए मुणिरूवे इंति कुसीले न ते निर(रि)रिकझा। दिसीएवि दुजाउय एए खलु तारिसे चेव ॥ १०॥ एएहि समं गमणं न जुकाए श्रम्ह अप्पसत्येणं । बच्चिस्सामो ऐए बयतुं समा जहिलाए ॥ १५ ॥ १ एकाकिनौ. २ वजन्तु 157 उप. १४
SR No.090458
Book TitleUpdeshsaptatika
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages498
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Sermon
File Size13 MB
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