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उपदेश
* सप्ततिका
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मा कुणसु नणु विसायं गयं वियाणितु पेयसीजुयलं । तं मिखही तुह अभरा गयरावसमाखदाहस्सएए॥ गिएहसु चिंतारयणं चिंतियसपत्थसाहग जद । जेण मणे मह तुजी संजाय तुह वयंसरस ॥ ए६॥ दिनो पुन्नोदय गहिट चिंतामणी कुमारेण | च (ब)वियं सुरेण गवसु ा तुम सेखवेय ॥ ७॥ चिन्सिासु तुम तिदिगंतु नियमदगेम्भि। सत्यहिचस्स सर्व संपकिस्सइ तुह मणि ॥ए । धम्मे जिपप्पणीए तुमए निचुजमो विहेवबो । जम्हा धम्मायत्ता सवेऽवि य सुरकसंजोगा | जह जखहरवुडीए वजीउ समुहसंति पत्तेहिं । तह पुनसमुदएणं रिछीबुद्धीसभिची ॥१०॥ शश जंपित्ता तत्तो पत्तो अमरो सुरालयं तुरियं । कुमरोऽवि गयणवतजनयरे चिंतश् श्मं चित्ते ॥११॥ न दु ससुरगिहे गंतु मह जुझर लाहवं जर्ड तत्थ । तो मयाणमंजरीए रूर्व कार्य जगाम तिहिं ॥१०॥ जपणीजण्या मिलिया कंठविलग्गा रुयंति गाढयरं । कत्थ गया श्रासि तुमं केणाणीया पुणो अहुणा ॥१३॥ दुर्च ती सर्व जहनीया खेयराहमेषाह। श्राषितु रयणचंदेण रयणसेहरसुपणेच ।। १०४॥ मुका कत्थ गर्न सो संपर तेहिं कुमारिया पुच । सा श्राह में वारे मुत्तुं कञ्चवि ग न मुणे ॥ १०५ ॥ कहमेस श्रपाहूई धागहर मग्गिहमि श रन्ना । तस्सन्नेसएकडो सुहमा सचत्य पविया ॥१०६॥ चन्ने य अस्सवारा तेहि समग्गेहिं कत्यवि न दिछ । तत्तो वखित राया विनविड नेव सो खयो ॥ १०७॥ तवचावि न सुणिया को जाणइ कत्व सो तिरोहू । तो जा सविसा सह पियाए महीनाहो ॥ १० ॥
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