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षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन अन्वय सहित सामान्यार्थ-( जीवा) अनंत जीव (पुग्गलकाया) अनंतपुद्गलकाय (आयासं) एक आकाश ( सेसा अस्थिकाइया) शेष दो अस्तिकाय धर्म और अधर्म द्रव्य ये पाँच अस्तिकाय ( अमया) अकृत्रिम हैं, (अस्थित्तमया) अपनी सत्ताको रखनेवाले हैं तथा ( हि) निश्चयसे ( लोगस्स) इस लोकके ( कारणभूदा) कारणरूप हैं !
विशेषार्थ-जीवादि पाँच अस्तिकाय हैं। इनको किसी पुरुषविशेषने बनाया नहीं है। ये अपनी सत्तासे ही निवृत अथवा निष्पन्न हुए हैं अतः विद्यमान हैं। यह लोक इन पाँच अस्ति-कायोंका व कायरहित एक प्रदेशी काल द्रव्यका इस तरह छः द्रव्योंका समुदाय है जैसा कहा है-'जीवादिषद्रव्याणां समवायो मेलापको लोकः' इति तथा यह लोक उत्पादव्यय व ध्रौव्य स्वरूप है इसीसे इस लोकका अस्तित्व देखा जाता है, क्योंकि कहा है "उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत् इति'' तथा यह लोक अर्ध्व, मध्य, अधो इन तीन अंशोंको रखनेवाला अवयवसहित है इससे इसको बहु प्रदेशी या कायपना कहा गया है। यह सूत्रका भाव है ।।२२।।
इस तरह छः द्रव्योंके मध्यमें जीवादि पाँच द्रव्यको अस्तिकाय संज्ञा है ऐसी सूचना - करते हुए गाथा पूर्ण की।
समय व्याख्या गाथा-२३ अत्रास्तिकाथत्वेनानुक्तस्यापि कालस्यार्थापन्नत्वं द्योतितम् । सम्भाव-सभावाणं जीवाणं तह य पोग्गलाणं च । परियट्टण-संभूदो कालो णियमेण पण्णत्तो ।। २३।।
सद्भावस्वभावानां जीवानां तथैव पुद्गलानां च । .
परिवर्तनसम्भूतः कालो नियमेन प्रज्ञप्तः ।।२३।। इह हि जीवानां पुद्गलानां च सत्तास्वभावत्वादस्ति प्रतिक्षणमुत्पादव्ययध्रौव्यैकवृत्तिरूपः परिणामः । स खलु सहकारिकारणसद्धावे दृष्टः, गतिस्थित्यवगाहपरिणामवत् । यस्तु सहकारिकारणं स कालः । तत्परिणामान्यथानुपपत्तिगम्यमानत्वादनुक्तोऽपि निश्चयकालोऽस्तीति निश्चीयते । यस्तु निश्चयकालपर्यायरूपो व्यवहारकालः स जीवपुद्गलपरिणामेनाभिव्यज्यमानत्वात्तदायत्त एवाभिगम्यत एवेति ।। २३।।