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________________ 4 पंचास्तिकाय प्राभृत ५५ अर्थात् कथंचित् या किसी अपेक्षा से द्रव्य है अर्थात् द्रव्य अपने ही द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावरूप चतुष्टयकी अपेक्षासे है । (२) स्यात् नास्ति अर्थात् कथंचित् या किसी अपेक्षासे द्रव्य नहीं है अर्थात् परद्रव्य, क्षेत्र, काल, भावरूप पर चतुष्टकीय अपेक्षासे द्रव्य नहीं है । (३) स्यात् अस्ति नास्ति अर्थात् कथंचित् द्रव्य है व नहीं दोनों रूप है । अर्थात् स्वचतुष्टयकी अपेक्षासे है परचतुष्टयकी अपेक्षा नहीं है (४) स्यात् अवक्तव्य अर्थात् कथंचित् द्रव्य वचनगोचर नहीं है अर्थात् एक समयमें यह नहीं कहा जा मकता कि द्रव्य स्वचष्ट्रयको अपेक्षा है व परचतुष्टयकी अपेक्षा नहीं है क्योंकि कहा है-क्रमप्रवृत्तिर्भारती अर्थात् वाणी क्रम- क्रमसे ही बोली जा सकती है। (५) स्यात् अस्ति अवक्तव्य अर्थात् कथंचित् द्रव्य है और अवक्तव्य दोनों रूप है । अर्थात् स्वद्रव्यादिचतुष्टयकी अपेक्षासे है परन्तु एक साथ स्वपरद्रव्यादि चतुष्टयकी अपेक्षा अवक्तव्य है । (६) स्यात् नास्ति अवक्तव्य अर्थात् कथंचित् द्रव्य नहीं और अवक्तव्य दोनों रूप है अर्थात् परद्रव्यादि चतुष्टयकी अपेक्षा नहीं है परन्तु एक साथ स्वपरद्रव्यादि चतुष्टयकी अपेक्षा अवक्तव्य है । (७) स्यात् अस्ति नास्ति अवक्तव्य अर्थात् किसी अपेक्षासे है व नहीं तथा अवक्तव्य तीनोंरुप है अर्थात् क्रमसे स्वचतुष्टयकी अपेक्षा है, पर चतुष्टय की अपेक्षा नहीं है परन्तु एक साथ स्वपरचतुष्टयकी अपेक्षा अवक्तव्य है। इस तरह ये सात भंग प्रश्नके उत्तरके यशसे द्रव्यमें संभव है। अर्थात् (९) क्या द्रव्य है ? (२) क्या द्रव्य नहीं है ? (३) क्या द्रव्य दोनों रूप है ? (४) क्या द्रव्य अवक्तव्य है ? (५) क्या द्रव्य अस्ति और अवक्तव्य दो रूप हैं ? (६) क्या द्रव्य नास्ति और अवक्तव्य दो रूप है ? (७) क्या द्रव्य अस्ति नास्ति और अवक्तव्य तीन रूप है ? इन प्रश्नोंके किये जानेपर उनका सात प्रकार ही समाधान उत्तरमें किया जाता है। यह प्रमाण सप्तभंगीका स्वरूप कहा । एक ही द्रव्य किस तरह सात भंगरूप होता है ? ऐसा प्रश्न होनेपर उसका समाधान करते हैं कि जैसे देवदत्त नामका पुरुष एक ही है वही मुख्य और गौणकी अपेक्षासे बहुत प्रकार है सो इस तरह है- कि वही देवदत्त अपने पुत्रकी अपेक्षासे पिता कहा जता है । वही अपने पिताकी अपेक्षासे पुत्र कहा जाता है । मामाकी अपेक्षासे भानजा कहा जाता है, वही अपने भानजेकी अपेक्षासे मामा कहा जाता है। अपनी स्त्रीकी अपेक्षासे भर्तार कहा जाता है, अपनी बहनकी अपेक्षासे भाई कहा जाता है। अपने शत्रुकी अपेक्षा शत्रु कहा जाता हैं वहीं अपने इष्टको अपेक्षा मित्र कहा जाता है इत्यादि । तैसे एक ही द्रव्य मुख्य और treat अपेक्षा वशसे सात भंग रूप हो जाता है। इसमें कोई दोष नहीं है, यह सामान्य व्याख्यान है । यदि इससे सूक्ष्म व्याख्यान करें तो द्रव्यमें जो सत् एक नित्य स्वभाव हैं,
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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