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________________ ८ पंचास्तिकाय प्राभृत करेंति तस्सेव पज्जाया-तस्यैव द्रव्यस्य व्ययोत्पादध्रुवत्वं कुर्वन्ति । के कर्तारः। पर्यायाः । अनेन किमुक्तं भवति-द्रव्यार्थिकनयेन द्रव्यस्यैवोत्पादव्ययध्रौव्याणि न भवन्ति किं तु पर्यायार्थिकनयेन भवन्ति । केन दृष्टान्तेन । सुवर्णगोरसमृत्तिकाबालवृद्धकुमारादिपरिणतपुरुषेषु भंगत्रयरूपेण, इत्यनेन पूर्वगाथाभणितमेव नित्यैकान्तमतनिराकरणं दृढीकृतं । अत्र सूत्रे शुद्धद्रव्यार्थिकनयेन नरनारकादिविभावपरिणामोत्पत्तिविनाशरहितमपि पर्यायार्थिकनयेन वीतरागनिर्विकल्पसमाधिसंभवेन सहजपरमानन्दरूपसुखरसास्वादेन स्वसंवेदनज्ञानरूपपर्यायेण परिणतं सहितं शुद्धजीवास्तिकायसंज्ञं शुद्धजीवद्रव्यमेवोपादेयमिति सूत्रतात्पर्य ।।११।। एवं द्रव्यार्थिकपयांथाथिकलक्षणनवद्वयव्याख्यानेन सूत्रं गतं । हिन्दी, तात्पर्यवृत्ति गाथा-११ उत्थानिका-आगे आधी गाथा पूर्वार्द्धसे द्रव्यार्थिकनयके द्वारा द्रव्यका लक्षण तथा दूसरी आधी उत्तरार्द्धसे पर्यायार्थिकनयके द्वारा पर्यायका लक्षण कहते हैं अन्वयसहित सामान्यार्थ-( दव्वस्य) द्रव्यका ( उप्पत्ती व विणासो) उपजना और विनसना (त्थि) नहीं होता है (य) किन्तु ( सम्भावो) उसका सत्तामात्र अस्तिपना [ अस्थि ] है । (तस्सेव) उसीहीकी ( पज्जाया) पर्यायें ( विगमुप्पादधुवत्तं ) व्यय उत्पाद तथा शुवपना ( कति) करती हैं। विशेषार्थ-द्रव्य अनादि निधन है उसमें द्रव्यार्थिक नयसे उत्पत्ति और विनाश नहीं होता है, वह अपने अस्तित्वसे सदा बना रहता है। इतना कहनेसे द्रव्य क्षणिक है इस एकान्त मतका निराकरण किया। उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यफ्ना पर्यायोंका पर्यायार्थिक नयसे होता है। उसके दृष्टांत अनेक हैं। जैसे सुवर्ण एक द्रव्य है उसके कुंडल बनाए तब कुंडलका उत्पाद, सवर्णकी पूर्व अवस्थाका व्यय व सुवर्णके सामान्य गुणोंका ध्रुवपना रहा, गोरस एक द्रव्य है उसकी मलाई बनाई तब मलाईका उत्पाद, पतले दूधपनेका व्यय व गोरसके सामान्य गुणोंका ध्रुवपना है । मिट्टी एक द्रव्य है उसका घड़ा बनाया सब घड़की पूर्वदशाका व्यय तथा मिट्टीपनेका ध्रुवपना है जो सर्व दशाओंमें बना रहता है । पुरुष एक व्यक्ति है वह बालकसे कुमार हुआ । कुमारसे युवान व युवानसे वृद्ध हुआ, इन अवस्थाओंमें जब आगेको अवस्था पैदा हुई तब पिछली अवस्थाका व्यय हुआ, पुरुषपना ध्रुव रहा । इससे नित्य एकांत मतका निराकरण दृढ किया गया । इस सूत्रमें शुद्ध द्रव्यार्थिक नयसे जो जीवद्रव्य नर-नारक आदि विभाव पर्यायोंकी उत्पत्ति और विनाशसे रहित है वही पर्यायार्थिक नयसे वीतराग निर्विकल्प समाधिसे उत्पन्न जो सहज परमानन्द रूप सुखरसका आस्वादन रूप जो स्वसंवेदन ज्ञानमय पर्याय उसमें परिणमन करते हुए जो शुद्ध जीवास्तिकाय नामधारी शुद्ध जीव द्रव्य है वही उपादेय या ग्रहण योग्य है, यह सूत्रका तात्पर्य है ।
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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