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________________ पंचास्तिकाय प्राभृत समुच्छेदः, उत्तर भावप्रादुर्भावश्च समुत्पादः पूर्वोत्तर भावोच्छेदोत्पादयोरपि स्वजातेरपरित्यागो ध्रौव्यम् । तानि सामान्यादेशादभिन्नानि विशेषादेशाद् भिन्नानि युगपद्धावीनि स्वभावभूतानि द्रव्यस्य लक्षणं भवन्तीति । गुणपर्याया वा द्रव्यलक्षणम् । अनेकान्तात्मकस्य वस्तुनोऽन्वयिनो विशेषा गुणा व्यतिरेकिणः पर्यायास्ते द्रव्ये यौगपद्येन क्रमेण च प्रवर्तमानाः कथंचिद्भिन्नाः कथंचिदभिन्ना: स्वभावभूताः द्रव्यलक्षणतामापद्यन्ते । त्रयाणामप्यमीषां द्रव्यलक्षणानामेकस्मि नभिहितेऽन्यदुभयमर्थादेवापद्यते । सच्चेदुत्पादव्ययध्रौव्यवच्च गुणपर्यायवच्च । उत्पादव्ययश्राव्यवच्चेत्सच्च गुणपर्यायवच्च । गुणपर्यायवच्चेत्सच्चोत्पादव्ययप्रौव्यवच्चेति । सद्धिनित्यानित्यस्वभावत्वाद् ध्रुवत्वमुत्पादव्ययात्मकतां च प्रथयति, ध्रुवत्वात्मकैर्गुणैरुत्पादव्ययात्मकैः पर्यायैश्च सहैकत्वं चाख्याति । उत्पादव्ययग्रौव्याणि तु नित्यानित्यस्वरूपं परमार्थं सदावेदयन्ति, गुणपर्यायांश्चात्मलाभनिवन्धनभूतान् प्रथयन्ति । गुणपर्यायांस्त्वन्वयव्यतिरेकित्वाद् श्रौव्योत्पत्तिविनाशान् सूचयन्ति नित्यानित्यस्वभावं परमार्थं सच्चोपलक्षयन्तीति ।। १० ।। अत्रोभयनयाभ्यां द्रव्यलक्षणं प्रतिभक्तम् । ४ ३ हिन्दी समयव्याख्या गाथा- १० अन्वयार्थ – (यत्) जो ( सल्लक्षणकम् ) 'सत्' लक्षणवाला है, ( उत्पादव्ययध्रुवत्त्वसंयुक्तम् ) जो उत्पादव्ययधौव्यसंयुक्त है (वा) अथवा ( गुणपर्यायाश्रयम् ) जो गुणपर्यायोंको आश्रय आधार हैं, (तद् ) उसे ( सर्वज्ञा: ) सर्वज्ञ ( द्रव्यं ) द्रव्य ( भागन्ति ) कहते हैं । टीका—यहाँ तीन प्रकारसे द्रव्यका लक्षण कहा है। 'सत्' द्रव्यका लक्षण है। पूर्वोक्त लक्षणवाली सत्तासे द्रव्य अभिन्न होनेके करण 'मत' स्वरूप ही द्रव्यका लक्षण हैं। और अनेकान्तात्मक अनेक धर्मों वाले द्रव्यका सत्मात्र ही स्वरूप नहीं है कि जिसके लक्ष्यलक्षणके विभागका अभाव हो । अथवा, उत्पादव्ययध्रौव्य द्रव्यका लक्षण हैं। एक जाति का अविरोधक ऐसा जो क्रमभावी • भावांका प्रवाह उसमें पूर्व भावका विनाश से व्यय हैं, उत्तर भावका प्रादुर्भाव सो उत्पाद हैं, और पूर्व उत्तर भावोंके व्यय उत्पाद होने पर भी स्वजातिका अत्याग सो ध्रौव्य है । वे उत्पाद-व्ययश्रीव्य जो कि सामान्य आदेशसे ( द्रव्यसे) अभिन्न हैं विशेष आदेशसे भिन्न है, युगपद् वर्तते हैं और स्वभावभूत हैं वे - द्रव्यका लक्षण है। अथवा, गुणपर्यायें द्रव्यका लक्षण हैं। अनेकान्तात्मक वस्तुके अन्वयी विशेष वे गुण हैं और व्यतिरेकी विशेष वे पर्यायें हैं। वे गुण और पर्यायें जो कि द्रव्यमे एक ही साथ तथा क्रमशः प्रवर्तत हैं, द्रव्यसे कथंचित् भिन्न और कथंचित् अभिन्न हैं तथा स्वभावभूत है - द्रव्यका लक्षण हैं I
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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