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________________ ३८ षड्द्रव्य - पंचास्तिकायवर्णन कथनकी तथा 'सत्' ऐसी प्रतीतिकी उपलब्धि होती है। और वह (सत्ता) 'सविश्वरूप है, क्योंकि वह विश्वरूपों सहित अर्थात् समस्त वस्तुविस्तारके विलक्षणवाले स्वभावों सहित वर्तती है। और वह (सत्ता) 'अनंतपर्यायमय' है, क्योंकि वह त्रिलक्षणवाली अनंत द्रव्यपर्यायरूप व्यक्तियोंसे व्याप्त हैं। ( इस प्रकार सामान्य विशेषात्मक सत्ताका उसके सामान्य पक्षकी अपेक्षासे अर्थात् महासत्तारूप अपेक्षासे वर्णन हुआ। ) ऐसी होने पर भी वह वास्तवमें निरंकुश नही है किन्तु सप्रतिपक्ष हैं । ( १ ) सत्ताको असत्ता प्रतिपक्ष हैं, ( २ ) त्रिलक्षणको अत्रिलक्षणपना प्रतिपक्ष हैं, ( ३ ) एकको अनेकपना प्रतिपक्ष है, (४) सर्वपदार्थस्थितको एकपदार्थस्थितपना प्रतिपक्ष हैं, (५) संविश्वरूपको एकरूपपना प्रतिपक्ष है, (६) अनंतपर्यायमयको एकपर्यायमयपना प्रतिपक्ष हैं । ( उपरोक्त सप्रतिपक्षपना स्पष्ट समझाया जाता है:-) सत्ता द्विविध हैं- महासत्ता और आवान्तर सत्ता । उनमें, सर्वपदार्थसमूहमें व्याप्त होनेवाली, सादृश्यअस्तित्वको सूचित करनेवाली महासत्ता ( सामान्यसत्ता ) तो कही जा चुकी है। दूसरी प्रतिनिश्चित ( एक-एक निश्चित ) वस्तुमें रहनेवाली, स्वरूप - अस्तित्वको सूचित करनेवाली अवान्तरसत्ता ( विशेषसत्ता ) है । ( ९ ) वहाँ, महासत्ता अवान्तर सत्तारूपसे असता और अवान्तरसना महासत्तारूपसे असत्ता है इसलिये सत्ताको असत्ता है ( अर्थात् जो सामान्यविशेषात्मक सत्ता महासत्तारूप होनेसे 'सत्ता' हैं वही अवान्तरसत्तारूप भी होनेसे 'असत्ता' भी हैं ) ( २ ) जिस स्वरूपसे उत्पाद हैं उसका ( उस स्वरूपका ) उस प्रकारसे उत्पाद एक ही लक्षण है, जिस स्वरूपसे व्यय हैं उसका ( उस स्वरूपका ) उस प्रकारसे व्यय एक ही लक्षण है और जिस स्वरूपसे श्रौत्र्य है, उसका ( उस स्वरूपका ) उस प्रकारसे श्राव्य एक ही लक्षण है इसलिये वस्तुके उत्पन्न होनेवाले, नष्ट होनेवाले और ध्रुव रहनेवाले स्वरूपोंमेंसे प्रत्येकको त्रिलक्षणका अभाव होनेसे त्रिलक्षागा ( सत्ता ) को अविलक्षणपना है ( अर्थात् जो सामान्यविशेषात्मक सत्ता महासत्तारूप होनेसे 'त्रिलक्षणा' है वही यहाँ कही हुई अवान्तरसत्तारूप भी होनेसे 'अत्रिलक्षणा' भी है | ) ( ३ ) एक वस्तुकी स्वरूपसत्ता अन्य वस्तुकी स्वरूपसत्ता नहीं है इसलिये एक (सत्ता) को अनेकपना हैं ( अर्थात् जो सामान्यविशेषात्मक सत्ता महासत्तारूपसे होनेसे 'एक' हैं वही यहाँ कही हुई अवान्तरसत्तारुप भी होने से 'अनेक' भी हैं ।) (४) प्रतिनिश्चित ( व्यक्तिगत निश्चित } पदार्थ में स्थित सत्ताओं द्वारा हो पदार्थोंका प्रतिनिश्चितपना ( भिन्न-भिन्न निश्चित व्यक्तित्व ) होता हैं इसलिये सर्वपदार्थस्थित ( सत्ता ) को एकपदार्थस्थितपना है ( अर्थात् जो सामान्यविशेषात्मक सत्ता महासत्तारूप होने से 'सर्वपदार्थस्थित' है वही यहाँ कही हुई अवान्तरसत्तारुप भी होने से 'एकपदार्थस्थित' भी हैं। ) ( ५ ) प्रतिनिश्चित एक-एक रूपवाली सत्ताओं द्वारा ही वस्तुओंका प्रतिनिश्चित एक एकरूप होता हैं इसलिये सविश्वरूप (सत्ता) को एकरूपपना है ( अर्थात् जो सामान्यविशेषात्मक सत्ता महासत्तारूप होनेसे 'सविश्वरूप' है वही यहाँ कही हुई अवान्तरसत्तारूप
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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