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________________ पंचास्तिकाय प्राभृत किन्तु सप्रतिपक्षा ! प्रतिपक्षो ह्यसत्ता सत्तायाः, अत्रिलक्षणत्वं त्रिलक्षणायाः, अनेकत्वमेकस्याः, एकपदार्थस्थितत्वं सर्वपदार्थस्थितायाः, एकरूपत्वं सविश्वरूपायाः, एकपर्या यत्वमनन्तपर्यायाया इति । द्विविधा हि सत्ता महासत्तावान्तरसत्ता च । तत्र सर्वपदार्थसार्थ - व्यापिनी सादृश्यास्तित्वसूचिका महासत्ता प्रोत्तैव । अन्या तु प्रतिनियतास्तुधिर्तिनी स्वरूपास्तित्वसूचिकाऽ वान्तरसत्ता । तत्र महासत्ताऽवान्तरसत्तारूपेणाऽसत्ताऽवान्तरसत्ता च महासत्तारूपेणाऽसत्तेत्यासत्ता सत्तायाः । येन स्वरूपेणोत्पादस्तत्तथोत्यादैकलक्षणमेव, येन स्वरूपेणोत्पादस्तत्तथोत्पादैकलक्षणमेव, येन स्वरूपेण ध्रौव्यं तत्तथा प्रौव्यैकलक्षणमेव, तत उत्पद्यमानोच्छिद्यमानावतिष्ठमानानां वस्तुनः स्वरूपाणां प्रत्येकं त्रैलक्षण्याभावादत्रिलक्षणत्वं त्रिलक्षणायाः । एकस्य वस्तुनः स्वरूपसत्ता नान्यस्य वस्तुनः स्वरूपसत्ता भवतीत्यनेकत्वमेकस्याः । प्रतिनियतपदार्थस्थिताभिरेव सत्ताभिः पदार्थानां प्रतिनियमो भवतीत्येकपदार्थस्थितत्वं सर्वपदार्थस्थितायाः । प्रतिनियतैकरूपाभिरेव सत्ताभिः प्रतिनियतैकरूपत्वं वस्तूनां भवतीत्येकरूपत्वं सविश्वरूपायाः। प्रतिपर्यायनियताभिरेव सत्ताभिः प्रतिनियतैकपर्यायाणामानन्त्यं भयतीत्येकपर्यायत्वमनन्तपर्यायायाः इति सर्वमनवहां सामान्यविशेषप्ररूपणप्रवणनयद्वयायत्तत्वात्तद्देशनायाः ।।८।। हिंदी समय व्याख्या गाथा-८ __ अन्वयार्थ ( सत्ता ) सत्ता ( भङ्गोत्पादध्रौव्यात्मिका ) उत्पादव्ययध्रौव्यात्मक, ( एका ) एक, ( सर्वपदार्था ) सर्वपदार्थस्थित, ( सविश्वरूपा ) सविश्वरूप, ( अनन्तपर्याया ) अनंतपर्यायमय और ( सप्रतिपक्षा ) सप्रतिपक्ष ( भवति ) है। टीका-यहाँ इस गाथा द्वारा अस्तित्वका स्वरूप कहा है। अस्तित्व अर्थात् सत्ता सत्का भाव अर्थात् सत्त्व ।। विद्यमानमात्र वस्तु न तो सर्वथा नित्यरूप होती है और न सर्वथा क्षणिकरूप होती हैं। सर्वथा नित्यवस्तुको वास्तवमें क्रमभावी भावोंका अभाव होनेसे विकार ( परिवर्तन, परिणाम ) कहाँ से होगा? और सर्वथा क्षणिक वस्तुमें वास्तवमें प्रत्यभिज्ञान का अभाव होनेसे एकप्रवाहपना कहाँसे रहेगा? इसलिये प्रत्यभिज्ञानके हेतुभूत किसी स्वरूपसे ध्रुव रहती हुई और किन्हीं दो क्रमवर्ती स्वरूपोंसे नष्ट होती हुई तथा उत्पन्न होती हुई—इसप्रकार परमार्थतः एकही कालमें तिगुनी [ तीनअंशवाली ] अवस्थाको धारण करती हुई वस्तु सत् जानना । इसीलिये ‘सत्ता' भी 'उत्पादव्ययध्रौव्यात्मक [ त्रिलक्षणा ] जानना, क्योंकि भाव और भाववानका कथंचित् एक स्वरूप होता है। और वह ( सत्ता ) 'एक' है, क्योंकि वह त्रिलक्षणवाले समस्त वस्तु विस्तारका सादृश्य सूचित करती है। और वह [ सत्ता] 'सर्वपदार्थस्थित' है क्योंकि उसके कारण ही ( सत्ता के कारण ही ) सर्व पदार्थोंमें त्रिलक्षणकी ( उत्पादव्ययध्रौव्यकी ), सत् ‘ऐसे
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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