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________________ पंचास्तिकाय प्राभृत ३०५ सुखपरिणतिरूपायाः इच्छाक्रियायाः स एव दुःखपरिणतिरूपाया भीतिक्रियायाः स एव च हिताहितपरिणतिरूपायाः कर्तृक्रियायाश्च स एव सुखदुःखफलानुभवनरूपाया भोक्तृक्रियायाश्च स एव कर्ता भवतीत्यसाधारणकार्येण जीवास्तित्वं ज्ञातव्यं । कर्तृत्वमशुभशुभशुद्धोपयोगरूपेण त्रिधा भिधात, अथाानुपचारतासद्भूतव्याबहारण द्रव्याकर्मकर्तृत्वं तथैवाशुद्धनिश्चयेन रागादिविकल्परूपभावकर्मकर्तृत्वं शुद्धनिश्चयेन तु केवलज्ञानादिशुद्धभावानां परिणमनरूपं कर्तृत्वं नयत्रयेण भोक्तृत्वमपि तथैवेति सूत्रतात्पर्य ।। तथा चोक्तं-- पुग्गल-कम्मादीणं कत्ता ववहारदो दु णिच्छयदो। चेदण-कम्मा-णादा सुद्धणया सुद्धभावाणं ।।१२२।। एवं भेदभावनामुख्यत्वेन प्रथमगाथा जीवस्यासाधारणकार्यकथनरूपेण द्वितीया चेति स्वतन्त्रगाथाद्वयेन पंचमस्थलं गतं । हिंदी ता०-उत्थानिका-आगे जानना देखना आदि कार्य जीवमें ही संभव होते हैं ऐसा निश्चय करते हैं - अन्वय सहित सामान्यार्थ-[जीव ] यह संसारी जीव [ सवं] सर्व पदार्थोको [ पस्सदि] देखता है ( जाणादि ) जानता है ( सुक्खं) सुखको ( इच्छदि) चाहता है ( दुक्खादो) दुःखोंसे ( विभेदि ) डरता है । हिदम् ] हितरूप अच्छा काम ( अहिदम्) अहितरूप बुराकाम ( कुव्यदि) करता है (वा) और ( तेसिं) उन भले बुरे कामोंका ( फलं ) फल ( भुंजदि ) भोगता है। विशेषार्थ-पदार्थोके जाननेरूप व देखनेरूप क्रियाका यह जीव ही कर्ता है, पुदल नहीं है, कर्म और नोकर्म शरीरादिके निमित्तसे होनेवाली सुखकी परिणति रूप इच्छाकी क्रियाका कर्ता भी यही जीव है, दुःखकी परिणतिसे भय करने रूप क्रियाका कर्ता भी यही जीव है, हित व अहितरूप क्रियाका कर्ता भी यही जीव है । व यही जीव सुख या दुःखकी अनुभवन रूप क्रियाका कर्ता है । ये सब असाधारण या मुख्य कार्य जीवके अस्तित्वको झलकाते हैं। जीवका कार्य अशुभ, शुभ या शुद्धोपयोग रूपसे तीन तरहका भी कहा जाता है अथवा यह जीव उपचार रहित असद्भूत व्यवहारनयसे द्रव्यकर्म ज्ञानावरणादि का कर्ता है । अशुद्ध निश्चयनयसे रागद्वेषादि विकल्परूप भाव-कर्मका कर्ता है तथा शुद्ध निश्शयनयसे केवलज्ञानादि शुद्ध भावों में परिणमन रूप कार्यका कर्ता है। इसी तरह तीनों नयोंसे इस जीवके भोक्तापना भी है अर्थात् व्यवहारनयसे पुद्गल कर्मके फलका, अशुद्ध निश्चयनयसे मैं सुखी, मैं दुःखी इस भावका तथा शुद्ध निश्चयनयसे आत्मिक आनंदका भोगनेवाला है। ऐसा ही कहा है-व्यवहारसे पुद्गल काँका कर्ता है, निश्चयसे चेतना भावोंका कर्ता है और शुद्धनय से शुद्ध भावोंका कर्ता है ।।१२।।
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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