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________________ पंचास्तिकाय प्राभृत २८७ प्रतिभासमयं यदात्मस्वरूपं तद्भावनारहितेनाल्पसुखार्थं स्पर्शनेन्द्रियविषयलांपट्यपरिणतेन जीवेन यदुपार्जितं स्पर्शनेन्द्रियजनकमेकेन्द्रियजातिनामकर्म यदुदयकाले स्पर्शनेन्द्रियक्षयोपशमं लब्ध्वा स्पर्शविषयज्ञानेन परिणमतीति सूत्राभिप्राय: ।।११०।। हिंदी ता०-उत्थानिका-अपो मंसारी मनोने, भीलर जो एकेन्द्री स्थावर जीव हैं उनके पाँच भेदोंको कहते हैं अन्वयसहित सामान्यार्थ-( पुढवी य उदगमगणीवाउवणफ्फदिजीवसंसिदा) पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और धनस्पति जीवोंसे आश्रय किये हुए ( काया) शरीर ( बहुगा वि) बहुत प्रकारके हैं तो भी (ते) वे शरीर ( तेसिं) उन जीवोंको ( खलु) वास्तव में ( मोहबहुलं ) मोहगर्भित ( फासं) स्पर्श इंद्रियके विषयको ( देति ) देते हैं। विशेषार्थ- यहाँ यह सूत्रका अभिप्राय है कि स्पर्शन इंद्रिय आदिसे रहित, अखंड एक .. ज्ञानका प्रकाशरूप आत्म-स्वरूप है उसकी भावनासे रहित होकर तथा अल्प संसारी सुखके लिये स्पर्शन इंद्रियके विषयमें लंपटी होकर इस जीवने जो स्पर्शनेंद्रिय पात्रको उत्पन्न करनेवाला एकेंद्रिय जाति नामा नामकर्म बाँधा है उसीके उदयके काल में यह संसारी जीव स्पर्शनेन्द्रिय ज्ञान मात्र क्षयोपशमको पाकर एकेंद्री पर्यायमें मात्र स्पर्शके विषयके ज्ञानसे परिणमन करता है ।।११०।। तित्थावर-तणु-जोगा अणिला-णल-काइया य तेसु तसा । मण-परिणाम-विरहिदा जीवा एइंदिया णेया ।।१११।। त्रयः स्थावरतनुयोगा अनिलानलकायिकाश्च तेषु त्रसाः । मनःपरिणामविरहिता जीवा एकेन्द्रिया ज्ञेयाः ।।१११।। अन्वयार्थ-[ तेषु ] उनमें, ( त्रयः ) तीन ( पृथ्वीकायिक, अपकायिक और वनस्पतिकायिक ) जीव ( स्थावरतनयोगाः ) स्थावर शरीरके संयोगवाले हैं (च) तथा ( अनिलानलकायिका: ) वायुकायिक और अग्निकायिक जीव ( त्रसा: ) स हैं, [ मन:परिणामविरहिताः ] वे सब मनपरिणामरहित ( एकेन्द्रिया: जीवाः ) एकेन्द्रिय जीव ( ज्ञेयाः ) जानना ।।१११।। सं० ता० -अथ व्यवहारेणाग्निवातकायिकानां त्रसत्वं दर्शयति-पृथिव्यवनस्पतयस्त्रयः स्थावरकाययोगात्संबंधात्स्थावरा भयंते । अनलानिलकायिकाः तेषु पंचस्थावरेषु मध्ये चलनक्रियां दृष्ट्वा व्यवहारेण वसा भयंते । यदि त्रसास्तर्हि किं मनो भविष्यति । नैवं । मणपरिणामविरहिदोमन: परिणामविहीनास्तथा चैकेन्द्रियाश्च ज्ञेयाः । के ? जीवा इति । तत्र स्थावरनामकर्मोदयाद्भिन्नमनंतज्ञानादिगुणसमूहादभिन्नत्वं यदात्मतत्त्वं तदनुभूतिरहितेन जीवेन यदुपार्जितं स्थावरनामकर्म
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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