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________________ २८६ raपदार्थ - मोक्षमार्ग वर्णन परिणतिको उपयोग कहते हैं। कहा भी है- "चैतन्यानुविधायि परिणाम उपयोगः " । मुक्त जीवों केवलज्ञान और केवल दर्शन उपयोग है जब कि संसारी जीव अशुद्ध या क्षयोपशमरूप मतिज्ञानादि उपयोग सहित हैं। संसारी जीव देहरहित आत्मतत्त्वसे विपरीत शरीरोंके धारी हैं जब कि सिद्ध जीव सर्व प्रकार शरीरसे रहित हैं ।। १०९ ।। इस तरह जीवाधिकारकी सूचनाकी गाथारूपसे प्रथम स्थल पूर्ण हुआ । पृथिवीकायिकादिपंचभेदोद्देशोऽयम् । पुढवी य उदगमगणी वाउ वणप्फदि जीव- संसिदा काया । देति खलु मोह - बहुलं फासं बहुगा वि ते तेसिं । ।११० ॥ पृथिवी चोदकमग्निर्वायुर्वनस्पतिः जीवसंश्रिताः कायाः । ददति खलु मोहबहुलं स्पर्श बहुका अपि ते तेषाम् । । ११० । । पृथिवीकायाः, अपकायाः, तेजः कायाः, वायुकायाः, वनस्पतिकायाः इत्येते पुद्गलपरिणामा बंधवशाज्जीवानुसंश्रिताः, अवांतरजातिभेदाद्बहुका अपि स्पर्शनिन्द्रियावरणक्षयोपशमभाजां जीवानां बहिरंगस्पर्शनेन्द्रियनिर्वृत्तिभूताः कर्मफलचेतनाप्रधानत्वान्मोहबहुलमेव स्पर्शोपलभ संपादयन्तीति ।। ११० ।। अन्वयार्थ - ( पृथिवी ) पृथ्वीकाय, ( उदकम् ) अप्काय, ( जलकाय ) ( अग्नि ) अग्निकाय, (वायुः ) वायुकाय (च) और ( वनस्पतिः ) वनस्पतिकाय ( कायाः ) यह कायें ( जीवासंश्रिताः ) जीवसहित हैं । ( बहुका: अपि ते ) ( अवान्तर जातियोंकी अपेक्षासे) उनकी भारी संख्या होनेपर भी वे सभी ( तेषाम् ) उनमें रहनेवाले जीवोंको ( खलु ) वास्तवमें ( मोहबहुलं ) अत्यन्त मोहसे संयुक्त ( स्पर्शं ददति ) स्पर्श देती हैं ( अर्थात् स्पर्शज्ञानमें निमित्त होती हैं ) । टीका-८, ( संसारी जीवोंके भेदोंसे ) पृथ्वीकायिक आदि पाँच भेदोंका कथन हैं। पृथ्वीकाय, अप्काय, तेजःकाय, वायुकाय और वनस्पतिकाय --- ऐसे यह पुलपरिणाम वशात् (बंधके कारण ) जीवसहित हैं। अवान्तर जातिरूप भेद करने पर वे अनेक होने पर भी वे सभी (पुद्गलपरिणाम ), स्पर्शनेन्द्रियावरणके क्षयोपशमवाले जीवोंके बहिरंग स्पर्शनेन्द्रियको रचनाभूत हुए कर्मफलचेतनाप्रधानपनेके कारण अत्यन्त मोह सहित ही स्पर्शोपलब्धि [ ज्ञान ] संप्राप्त कराते हैं ।। ११०|| सं०ता० अथ पृथिवीकायादिपंचभेदान् प्रतिपादयति- पृथिवीजलाग्निवायुवनस्पतिजीवान् कर्मतापत्रान् संश्रिताः कायाः ददति प्रयच्छन्ति खलु स्फुटं । कं । मोहबहुलं स्पर्शविषयं बहुका अंतर्भेदैर्बहुसंख्या अपि ते कायास्तेषां जीवानामिति । अत्र स्पर्शनेन्द्रियादिरहितमखंडेकज्ञान
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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