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________________ पंचास्तिकाय प्राभृत २६३ वहाँ, व्यवहारकाल क्षणभंगी है, क्योंकि वह मात्र सूक्ष्म पर्याय जितना ही ( समयमात्र जितना ही) है, निश्चयकाल नित्य है, क्योंकि वह अपने गुण पर्यायोंके आधारभूत द्रव्यरूपसे सदैव अविनाशी है ||१००॥ सं० ता०-अथ व्यवहारकालस्य निश्चयकालस्य च स्वरूपं व्यवस्थापयति, कालो-समयनिमिषघटिकादिवसादिरूपो व्यवहारकालः । स च कथंभूतः । परिणामभवो-मंदगतिरूपेणाणोरण्वंतरव्यतिक्रमणं नयनपुटविघटनं जलभाजनहस्तविज्ञानरूपपुरुषचेष्टितं दिनकरबिंबागमनमित्येवं स्वभाव: पुद्गलद्रव्यक्रियापर्यायरूपः परिणामस्तेन व्यज्यमानत्वात्प्रकटीक्रियमाणवाद्धे तोर्व्यवहारेण पुद्गलपरिणामभव इत्युपनीयते, परमार्थेन तु कालाणुद्रव्यरूपनिश्चयकालस्य पर्याय: । परिणामो, दव्वकालसंभूदो-अणोरण्वंतरव्यतिक्रमणप्रभृतिपूर्वोक्तपुद्गलपरिणामस्तु शीतकाले पाठकस्याग्निवत् कुम्भकारचक्रभ्रमणविषयेऽधस्तनशिलावहिरङ्गसहकारिकारणभूतेन कालाणुरूपद्रव्यकालेनोत्पत्रत्वाद् द्रव्यकालसंभूतः दोण्हं एस सहाओ-द्वयोनिश्चयव्यवहारकालयोरेषः पूर्वोक्तः स्वभाव: । स किंरूप: व्यवहारकाल? पुद्गलपरिणामेन व्यज्यमानत्वात्परिणामजन्य: । निश्चयकालस्तु परिणामजनकः । कालो खणभंगुरो-समयरूपो व्यवहारकाल क्षणभंगुरः, णियदो-स्वकीयगुणपर्यायाधारत्वेन सर्वदैवाविनश्वरत्वाद् नित्य इति । अत्र यद्यपि काललब्धिवशेन भेदाभेदरत्नत्रयलक्षणं मोक्षमार्ग प्राप्त जीवो रागादिरहितनित्यानंदैकरवभावमपादेयभूतं पारमार्थिकसुखं साधयति तथा जीवस्तस्योपादानकारणं न च काल इत्यभिप्रायः । तथा चोक्तं—'आत्मोपादानसिद्ध' मित्यादिरिति ||१००।। हिंदी ता०-उत्थानिका-आगे व्यवहार और निश्चयकालका स्वरूप दिखाते हैं अन्वयसहित सामान्यार्थ-( कालो ) व्यवहार काल ( परिणामभवो ) पुद्गलोके परिणमनसे उत्पन्न होता है ( परिणामो) पुनलादिका परिणमन ( दव्यकालसंभूदो) द्रव्यकालके द्वारा होता है ( दोण्हं) दोनोंका (एस) ऐसा ( सहावो) स्वभाव है। (कालो) यह व्यवहार काल ( खणभंगुरो) क्षणभंगुर है (णियदो) परन्तु निश्चयकाल अविनाशी है। विशेषार्थ-समय, निमिष, घडी, दिन, आदिको व्यवहारकाल कहते हैं। जब एक पुद्गल का परमाणु एक कालाणुसे निकटवर्ती कालाणुपर मंदगतिसे उल्लंघ कर जाता है तब समय नामका सबसे सूक्ष्म व्यवहारकाल प्रगट होता है अर्थात् इतनी देरको समय कहते हैं। आंखोंकी पलक लगानेसे रिमिष, जलके वर्तन, हाथके विज्ञान आदि पुरुषको चेष्टासे एक घड़ी तथा सूर्यके बिम्बके आनेसे दिन प्रगट होता है । इत्यादि रूपसे पुद्गलद्रव्यकी हलन चलन रूप पर्यायको परिणाम कहते हैं। उससे जो प्रगट होता है इसलिये इस व्यवहारकालको व्यवहारमें पुदलपरिणामसे उत्पन्न हुआ कहते हैं, निश्चयसे यह कालाणुरूप
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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