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________________ पंचास्तिकाय प्राभृत २५५ निश्चयेन पृथग्रूपेणोपलब्धविशेषाणि । इत्थंभूतानि संति किं कुर्वन्ति ? करेंति- कुर्वन्ति, एयत्तमण्णतं - व्यवहारेणैकत्वं निश्चयेनान्यत्वं चेति । तथाहि--यथायं जीव: पुद्गलादिपंचद्रव्यैः सह शेषजीवांतर - श्चैकक्षेत्रात्रगाहित्वाद्व्यवहारेणैकत्वं करोति निश्चयेन तु समस्तवस्तुगतानंतधर्मयुगपत्प्रकाशेन परमचैतन्यविलासलक्षणज्ञानगुणेन भिन्नत्वं च तथा धर्माधर्मलोकाकाशद्रव्याण्येक क्षेत्रावगाहेनाभिन्नत्वात्समानपरिणामत्वाच्चोपचरितासद्भूतव्यवहारेण परस्परमेकत्वं कुर्वन्ति, निश्चयनयेन गतिस्थित्यवगाहरूपस्वकीयस्वकीयलक्षणैर्नानात्वं चेति सूत्रार्थः ॥ ९६ ॥ एवं धर्माधर्मलोकाकाशानामेकत्वान्यत्वकथनरूपेण तृतीयस्थले गाथासूत्रं गतं । इति पंचास्तिकायषद्रव्यप्रतिपादकप्रथममहाधिकारमध्ये गाथासप्तकपर्यंतं स्थलत्रयेणाकाशास्तिकायव्याख्यानरूपः सप्तमोंत्तराधिकारः समाप्तः । हिंदी ता० - उत्थानिका- आगे धर्म, अधर्म, आकाश एक क्षेत्रमें अवगाह पारहे हैं इसलिये इनमें व्यवहार से एकपना है परन्तु निश्चयसे भिन्नपना है । अन्वयसहित सामान्यार्थ - ( धम्माधम्मागासा) धर्म, अधर्म और आकाश (समाणपरिमाणा ) समान परिमाणको रखनेवाले हैं अतएव [ अपुधब्भूदा ] अलग नहीं हैं, परन्तु [ पुधगुवलद्ध-विसेसा ] अलग अलग अपने अपने द्रव्यपनेको रखते हैं इसलिये ( एगतं ) एकपने [ अण्णत्तं ] व अनेकपनेको [ करति ] करते हैं । विशेषार्थ-व्यवहारसे धर्म, अधर्म व लोकाकाश एक समान असंख्यात प्रदेशको रखने वाले हैं इसलिये इनमें एकता है, परन्तु निश्चयसे ये तीनों अपने अपने स्वभाव में है, इससे अनेकता या भिन्नता है। जैसे यह जीव पुगल आदि पांच द्रव्योंके साथ व अन्य जीवोंके साथ एक क्षेत्रमें अवगाहरूप रहनेसे व्यवहारसे एकपनेको बताता है, परन्तु निश्चयनयसे भिन्नपनेको प्रगट करता है, क्योंकि यह जीव एक समयमें सर्व पदार्थोंमें प्राप्त अनंत स्वभावोंको प्रकाश करने वाले परमचैतन्यके विलासरूप अपने ज्ञान गुणसे शोभायमान है । तैसे ही धर्म, अधर्म और लोकाकाश द्रव्य एक क्षेत्रमें अवगाहरूप होनेसे अभिन्न है तथा समान प्रदेशोंका परिमाण रखते हैं इसलिये उपचरित असद्भूत व्यवहारनयसे परस्पर एकता करते हैं, परन्तु निश्चयनयसे अपने अपने गति स्थिति व अवगाह लक्षणको रचानेसे नानापना या भिन्नपना करते हैं- यह सूत्रका अर्थ है ।। ९६ ।। इसतरह धर्म, अधर्म व लोकाकाशमें एकता व अनेकताको कहते हुए तीसरे स्थलमें गाथासूत्र कहा । इसतरह पंचास्तिकाय छः द्रव्यके प्रतिपादक महाधिकारके मध्यमें सात गाथाओं तक तीन स्थालोके द्वारा आकाश नाम अस्तिकायका व्याख्यानरूप सातवाँ अन्तर अधिकार पूर्ण हुआ ।
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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