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________________ पंचास्तिकाय प्राभृत २४७ गाहत्वात्समानपरिमाणत्वाच्चासद्भूतव्यवहारेणैकत्वं भित्रलक्षणत्वान्निश्चयेन पृथक्त्वमिति प्रतिपादनमुख्यत्वेन “धम्माधम्मागासा" इत्यादि सूत्रमेकं । एवं सप्तगाथाभिः स्थलत्रयेणाकाशास्तिकायव्याख्याने समुदायपातनिका । तद्यथा आकाशस्वरूपं कथयति ससि जीवाणं सर्वेषां जीवानां । सखाणं तह ध-शेषाणां तथैव च धर्माधर्मकलानां, पोग्गलाणं च --- - पुद्गलानां च । जं देदि-यत्कर्तृ ददाति । किं । विवरं विवरं छिद्रं अवकाशमवगाहं, अखिलं -- समस्तं तं तत्पूर्वोक्तं, लोगे— लोकविषये । हवदि आगासंआकाशं भवति । अत्राह शिवकुमारमहाराजनामा - हे भगवन् ! लोकस्तावदसंख्यातप्रदेशः तत्र लोके निश्चयनयेन नित्यनिरंजनज्ञानमयपरमानंदैकलक्षणाः अनंतानंतजीवास्तेभ्योप्यनंतगुणाः पुद्गला लोकाकाशप्रमितप्रदेशप्रमाणाः कालाणवो धर्माधर्मौ चेति सर्वे कथमवकाशं लभत इति । भगवानाह - एका परके अनेक प्रदीपप्रकाशवदे कगूढनागरसगद्याणके बहुसुवर्णवदेकस्मिन्त्रुष्ट्रीक्षीरघटे मधुघटवदेकस्मिन् भूमिगृहे जयघंटादिशब्दवद्विशिष्टावगाहनगुणेनासंख्येयप्रदेशेपि लोके अनंतसंख्या अपि जीवादयोऽवकाशं लभंत इत्यभिप्रायः || १० || हिंदी ता० - उत्थानिका - अथानंतर शुद्धबुद्ध एक स्वभावरूप शुद्ध जीवास्तिकाय है जो निश्चयसे मोक्षका कारण है व सर्व तरह ग्रहण करने योग्य है। उससे भिन्न जो आकाश अस्तिकाय है, उसका वर्णन सात गाथाओंमें करते हैं। तहां सात गाथाओंके मध्यमें पहले ही लोकाकाश और अलोकाकाश दोनोंका स्वरूप कहते हुए "सव्वेसिं जीवाणं" इत्यादि गाथाएं दो हैं। आगे आकाश ही गति या स्थिति दोनों कर लेगा। धर्म और अधर्म द्रव्योंकी क्या आवश्यकता है ? ऐसे पूर्व पक्ष निराकरण करनेकी मुख्यतासे "आगासं अवगासं" इत्यादि पाठक्रमसे गाथाएँ चार हैं। फिर धर्म अधर्म और लोकाकाश एक क्षेत्र अवगाह मानेसे व समान मापके होनेसे असद्भूत व्यवहारसे एक हैं तो भी निश्चयसे भिन्न भिन्न लक्षण रखनेसे भिन्न भिन्न हैं ऐसा कहते हुए 'धम्माधम्मागासा'' इत्यादि सूत्र एक है । इस तरह सात गाथाओंसे तीन स्थलोंके द्वारा आकाश अस्तिकायके कथनमें समुदाय पातनिका है। ** हिन्दी ता० - अब आकाश का स्वरूप कहते हैं अन्वयसहित सामान्यार्थः - ( सव्वेसिं ) सर्व ही ( जीवाणं ) जीवोंको ( तय य) तथा ( पोग्गलाणं ) पुहलोंको (च) और ( सेसाणं ) शेष, धर्म, अधर्म व कालको ( जं ) जो ( विवरं ) अवकाश ( देदि) देता है ( तं ) सो ( अखिलं ) संपूर्ण ( आयासं) आकाश ( लोए) इस लोक में ( हवदि) होता है । विशेषार्थ - यहाँ शिवकुमार महाराजने कहा कि हे भगवान् ! यह लोक तो असंख्यात
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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