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________________ पंचास्तिकाय प्राभृत २२९ अशब्द है और ( स्कंधांतरितं ) स्कन्धकेभीतर हो तथापि ( द्रव्यं ) निश्चयसे एक ही द्रव्य है ऐसा ( विजानीहि ) जानो। टीका—यह परमाणुद्रव्यमें गुण-पर्याय वर्तनेका ( गुण और पर्याय होनेका ) कथन है । सर्वत्र परमाणुमें रस-वर्ण-गंध-स्पर्श सहभावी गुण होते हैं, और वे गुण उसमें क्रमवती निज पर्यायों सहित वर्तते हैं। वह इस प्रकार है-पांच रसपर्यायोंमेंसे एक सम कोई एक ( पर्याय ) सहित रस वर्तता है, पांच वर्णपर्यायोंमेंसे एक समय किसी एक ( पर्याय ) सहित वर्ण वर्तता है, दो गंधपर्यायोंमेंसे एक समय किसी एक ( पर्याय ) सहित गंध वर्तता है, शीतस्निगध, शीत-रूक्ष उष्ण-स्निग्ध, और उष्णरुक्ष इन चार स्पर्शपर्यायोंके युगलमेंसे एक समय किसी एक युगल स्पर्श वर्तता है। इस प्रकार जिसमें गुणोंका वर्तन ( अस्तित्व ) कहा गया है ऐसा यह परमाणु शब्दस्कन्धरूपसे परिणमित होनेकी शक्तिरूप स्वभाववाला होनेसे शब्द का कारण है, एकप्रदेशी होनेके कारण शब्दपर्यायपरिणतिरूप वृत्ति के अभावसे अशब्द है, और स्निग्धरूक्षत्वके कारण बंध होनेसे अनेक परमाणुओंकी एकत्वपरिणतिरूप स्कन्धके भीतर रहा हो तथापि स्वभावको छोड़ता हुआ, सख्याको प्राप्त होनेसे ( अर्थात् परिपूर्ण एककी भांति पृथक् गिनतीमें आनेसे) अकेला ही द्रव्य है ।।८१।। सं० ता०-अथ परमाणुद्रव्ये गुणपर्यायस्वरूपं कथयति, “एयरसवण्णगंधं दोफासं-एकरसवर्णगंधद्विस्पर्शः । तथाहि-तत्र परमणौ तिक्तादिपंचरसपर्यायाणामेकतमेनैकेनैकदा रसो वर्तते शुक्लादिपंचवर्णपर्यायाणामेकतमेनैकेनैकदा वर्णों वर्तते सुरभिरसुरभिरूपगंधपर्याययोर्द्वयोरेकतरेणकेनैकदा गन्धो वर्तते शीतस्निग्धशीतरूक्ष उष्णस्निग्धउष्णरुक्षाणां चतुर्णा स्पर्शपर्यायद्वंद्वानामेकतपेनैकेनैकदा स्पशों वर्तते । सद्दकोरणमसइं-शब्द-कारणोप्यशब्द आत्मवत् । यथात्मा व्यवहारेण ताल्चोष्ठप्टव्यापारेण शब्दकारणभतोपि निश्चयेनातीन्द्रियज्ञानविषयत्वाच्छब्दज्ञानविषयो न भवति शब्दादिपुद्गलपर्यायरूपो वा ना भवति तेन कारणेनाशब्दः तथा परमाणुरपि शक्तिरूपेण शब्दकारणभूतोप्येकप्रदेशत्वेन शब्दव्यक्त्यभावादशब्दः । खंदंतरिदं दव्वं परमाणुं तं वियाणाहियमेवमुक्तवर्णादिगुणशब्दादिपर्यायवृत्तिविशिष्टस्कंधांतरितं द्रव्यरूपस्कंधपरमाणुं विजानीहि परमात्मवदेव । तद्यथा । यथा परमात्मा व्यवहारेण द्रव्यभावरूपकर्मस्कंन्धांतर्गतोपि निश्चयनयेन शुद्धबुद्धकस्वभाव एव तथा परमाणुरपि व्यवहारेण स्कंधांतर्गतोपि निश्चयनयेन स्कंधबहिर्भूतशुद्धद्रव्यरूप एव । अथवा स्कंधांतरित इति कोऽर्थ: स्कंधात्पूर्वमेव भिन्न इत्यभिप्राय: ।।८१।। एवं परमाणुद्रव्य-वर्णादिगुणस्वरूपशब्दादिपर्यायस्वरूपकथनेन पंचमगाथा गता। इति परमाणुद्रव्यरूपेण द्वितीयस्थले समुदायेन गाथापंचकं गतं । हिन्दी ता०-उत्यानिका-आगे परमाणु द्रव्यमें गुणपर्यायका स्वरूप कहते हैं
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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