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________________ २२८ षद्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन केवली भगवान एक समयरूप व्यवहार कालको तथा उसकी अनंत संख्याओंके ज्ञाता है तैसे ही एक परमाणु भी एकप्रदेशी होकर मंद गतिसे एक कालाणुसे पासवाले दूसरे कालाणुको उल्लंघन करता हुआ समयरूप सूक्ष्म व्यवहारकालका और उसकी संख्याका भेद करनेवाला होता है । संख्या द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावरूपसे चार प्रकारकी होती है सो जघन्य और उत्कृष्टके भेदसे दो दो प्रकार है । एक परमाणुरूप जघन्य द्रव्यसंख्या है। अनन्त परमाणुके पुंजरूप द्रव्यसंख्या हैं। एक प्रदेशरूप जघन्य क्षेत्र संख्या है। अनंत प्रदेशरूप उत्कृष्ट क्षेत्रसंख्या है। एक समय रूप जघन्य व्यवहार काल संख्या है। अनंत रूप उत्कृष्ट व्यवहारकाल संख्या है। परमाणु द्रव्यमें वर्णादि गुणोंकी जो जघन्य शक्ति सो जघन्य भाव संख्या है उस ही परमाणु द्रव्यमें सबसे उत्कृष्ट जो वर्णादिकी शक्ति है सो उत्कृष्ट भाव संख्या है । इसतरह जघन्य व उत्कृष्ट द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावकी संख्या जानना योग्य है ।।८।। इस तरह परमाणु द्रव्यके एक प्रदेशको आधार करके समय आदि व्यवहार कालके कथन की मुख्यतासे एक आदि संख्याको कहते हुए दूसरे स्थलमें चार गाथाएँ कहीं। परमाणुद्रव्ये गुणपर्यायवृत्तिप्ररूपणमेतत् । एय-रस-वण्ण-गंधं दो फासं सद्दकारण-मसई । खंधंत-रिदं दव्वं परमाणुं तं वियाणाहि ।। ८१।। एकरसवर्णगंधं द्विस्पर्श शब्दकारणमशब्दम् । स्कंधांतरितं द्रव्यं परमाणुं तं विजानीहि ।। ८१।। सर्वत्रापि परमाणौ रसवर्णगंधस्पर्शाः सहभुवो गुणाः । ते च क्रमप्रवृत्तस्तत्र स्वपर्यायैर्वर्तते तथा हि-पञ्चानां रसपर्यायायाणामन्यतमेनैकेनैकदा रसो वर्तते । पञ्चानां वर्णपर्यायाणामन्यतमेनकेनैकदा वणों वर्तते । उभयोगंधपर्याययोरन्यतरेणैकेनैकदा गंधो वर्तते । चतुर्णा शीतस्निग्धशीतरूक्षोष्णस्निग्धोष्णारूक्षरूपाणां स्पर्शपर्यायद्वन्द्वानामन्यतमेनैकेनैकदा स्पर्शो वर्तते । एवमयमुक्तगुणवृत्तिः परमाणुः शब्दस्कंथपरिणतिशक्तिस्वभावात् शब्दकारणम् । एकप्रदेशत्वेन शब्दपर्यायपरिणतिवृत्त्यभावादशब्दः । स्निग्धरूक्षत्वप्रत्ययबंथवशादनेकत्वपरिणतिरूपस्कंधांतरितोऽपि स्वभावमपरित्यजन्नुपात्तसंख्यत्वादेक एव द्रव्यमिति ।। ८१।। अन्वयार्थ ( तं परमाणु ) वह परमाणु [ एकरसवर्णगंधं ] एक रसवाला, एक वर्णवाला, एक गंधवाला तथा ( द्विस्पर्श ) दो स्पर्शवाला है, [शब्दकारणम् ] शब्दका कारण है, ( अशब्दम् )
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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