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________________ पंचास्तिकाय प्राभृत २२१ क्रियते न च सत्ताप्रदेशभेदेन । वस्तुतस्तु य एव परमाणोरादिमध्यांतभूतप्रदेशः स एव रूपादिगुणानामपि अथवा मूर्त इत्यादिश्यते कथ्यते न च दृष्ट्या दृश्यते तेनादेशमात्रमूर्तः, धाउचउक्कस्स कारणं जो दुनिश्चयेन शुद्धबुद्धकस्वभावैरपि पृथिव्यादिजीवैर्व्यवहारेणानादिकर्मोदयवशेन यानि पृथिव्यप्तेजोवायुधातुचतुष्कसंज्ञानि शरीराणि गृहीतानि तिष्ठन्ति तेषामन्येषां च जीवेनागृहीतानां हेतुत्वेन निमित्तत्वाद्धातुचतुष्कस्य कारणं यस्तु 'सो णेओ परमाणू' य: पूर्व कथित एकोपि परमाणुः पृथिव्यादिधातुचतुष्करूपेण कालांतरेण परिणमति स परमाणुरिति ज्ञेयः । परिणामगुणो औदयिकादिभावचतुष्टयरहित्वेन पारिणामिकगुण: । पुन: किंविशिष्टः । सयमसद्दो-एकप्रदेशत्वेन कृत्वानंतपरमाणुपिंडलक्षणेन शब्दपर्यायेण सह विलक्षणत्वात्स्वयं व्यक्तिरूपेणाशब्द इति सूत्रार्थ: ।।७८।। एवं परमाणूनां पृथिव्यादिजातिभेदनिराकरणकथनेन द्वितीयगाथा गता। हिं० ता०-उत्थानिका-आगे कहते हैं कि पृथ्वी आदि जातिके भिन्न-भिन्न परमाणु नहीं होते हैं अन्वय सहित सामान्यार्थ-( जो दु) जो कोई ( आदेसमत्तमुत्तो) मूर्तिक कहलाता है है व ( धादुचदुक्कस्स कारणं) चार धातुओंका कारण है ( परिणामगुणो) परिणमन होना जिसका स्वभाव है व जो (सयम् ) स्वयं ( असहो) शब्दरहित है ( सो परमाणु) सो परमाणु (णेओ) जानना चाहिये। विशेषार्थ-परमाणु में वर्णादि गुण रहते हैं उनका भेद संज्ञा आदिकी अपेक्षासे ही है प्रदेशोंकी अपेक्षा उनका भेद नहीं किया जा सकता है। वे वर्णादि गुण परमाणुमें सर्वांग व्यापक हैं । वस्तुस्वरूप यह है कि जो आदि, मध्य, अंत प्रदेश परमाणुका है वही उसके भीतर व्याप्त उनके रूपादि गुणोंका है अथवा वह परमाणु मूर्तिक कहा जाता है, दृष्टिसे नहीं देखा जाता है तो भी रूपादि कारणोंसे परमाणु मूर्तिक है । निश्चयनयसे पृथ्वी, अप, तेज, वायुकायिक जीव शुद्ध बुद्ध एक स्वभावधारी है परन्तु व्यवहारनयसे अनादिकर्मोके उदयके यशसे जो उन जीवोंने पृथ्वी, जल, अग्नि तथा वायु नामके शरीर ग्रहण कर रक्खे हैं उन शरीरोंके तथा उन जीवोंसे न ग्रहण किये हुए पृथ्वी, जल, अग्नि व वायुकायके स्कंधोंके उपादान कारण परमाणु हैं इससे ये परमाणु चार धातुओंके कारण हैं। यह परमाणु जड़ होनेसे औदयिक, औपशमिक, क्षायोपशमिक क्षायिक इन चार भावोंसे रहित केवल अपने पारिणामिकभावोंको रखनेवाला होनेसे परिणमनशील हैं। एक ही परमाणु कालांतरमें बदलते बदलते पृथ्वी या जल या अग्नि या वायु हो जाता है । यह परमाणु एक प्रदेशी होता है इससे यह अनंत परमाणुओंका पिंड रूप जो शब्दपर्याय है उससे विलक्षण है । इसलिये स्वयं व्यक्तरूपसे शब्दरहित है ऐसा परमाणु जानना चाहिये ।।७८।।
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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