SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 172
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १६८ षड्वव्य-पंचास्तिकायवर्णन किमनादिनिधनाः, किं सादिसनिधनाः, किं सानिधनाः, किं तदाकारेण परिणताः, किमपरिणता: भविष्यतीत्याशंक्येदमक्तम् । जीवा हि सहजचैतन्यलक्षणपारिणामिकभावेनानादिनिधनाः त एवौदयिकक्षायोपशामकौपशमिकभावः सादिसनिधनाः । त एव क्षायिकभावेन साद्यनिधना; न च सादित्वात्सनिघनत्वं क्षायिकभावस्याशक्यम् । स खलूपाधिनिवृत्तौ प्रवर्तमानः सिद्धभाव इव सद्भाव एव जीवस्य, सद्भावेन चानंता एव जीवाः प्रतिज्ञायते । न च तेषामनादिनिधनसहजचैतन्यलक्षणकभावानां सादिसनिधनानि सानिधनानि भावांतराणि नोपपद्यंत इति वक्तव्यम्, ते खल्वनादिकर्ममलीमसाः पंकसंपृक्ततोयवत्तदाकारेण परिणतत्वात्पञ्चप्रधानगुणप्रधानत्वेनैवानुभूयंत इति ।।५३।। हिन्दी समय व्याख्या गाथा-५३ अन्वयार्थ-( जीवा: ) जीव ( अनादिनिधनाः ) ( पारिणामिकभावसे ) अनादि-अनंत है. ( सांताः ) ( औपशामक आदि तीन भावोंसे ) सांत ( अर्थात् सादि-सांत ) हैं ( च ) ( जीवभावात् अनंता: ) जीवभावसे अनंत हैं ( अर्थात् जीव सद्भावरूप क्षायिकभावसे सादि-अनंत हैं) ( सद्भावत: अनंता: ) क्योंकि सद्भावसे जीव अनंत ही होते हैं । ( पञ्चाग्रगुप्पप्रधानाः च ) वे पांच मुख्य गुणोंसे प्रधानतावाले हैं। टीका-निश्चयसे पर-भावोंका कर्तृत्व न होनेसे जीव स्व-भावोंके कर्ता होते हैं, और उन्हें. ( अपने भावोंको ) करते हुए, क्या वे अनादि-अनंत हैं ? क्या सादि-सांत है ? क्या आदि अनंत हैं ? क्या तदाकाररूप ( उस-रूप ) परिणत हैं ? क्या तदाकाररूप अपरिणत है ? ऐसी आशंका करके यह कहा गया है। अर्थात् उन आशंकाओंके समाधानरूपसे यह गाथा कही गई है। जीव वास्तवमें सहजचैतन्यलक्षण पारिणामिक भावसे अनादि-अनन्त हैं । वे ही औदायक. क्षायोपशमिक और औपशमिक भावोंसे सादि-सांत हैं। वे ही क्षायिक भावसे सादि-अनन्त हैं। ___ क्षायिक भाव सादि होनेसे वह सान्त होगा' ऐसी आशंका करना योग्य नहीं है । कारण इस प्रकार है-वह वास्तवमें उपाधिकी निवृत्ति होने पर प्रवर्तता हुआ, सिद्धभावको भांति, जीवका सद्भाव ही है ( अर्थात् कमोंपाधिके क्षयरूपसे प्रवर्तता है इसलिये क्षायिक भाव जीवका सद्भाव ही है ) और सद्भावसे तो जीव अनन्त ही स्वीकार किये जाते हैं इसलिये क्षायिकभावने जीत्र अनन्त ही हैं अर्थात् विनाशरहित ही हैं। पुनश्च, अनादि-अनन्त सहजचैतन्यलक्षण एक भाववाले उनके सादि-सांत और यादिअनन्त भावान्तर घटित नहीं होते ऐसा कहना योग्य नहीं है, [ क्योंकि ] वे वास्तव में अनादि कर्मस मलिन वर्तते हुए कीचड़से संपृक्त जलकी भांति तदाकाररूप परिणत होने के कारण, पांच प्रधान गुणोंसे प्रधानतावाले ही अनुभवमें आते हैं ।। ५३।।
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy