SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 160
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १५६ षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन समय व्याख्या गाथा-४७ वस्तुत्वभेदाभेदोदाहरणमेतत् । णाणं धणं च कुव्वदि धणिणं जह णाणिणं च दुविधेहिं । भण्णंति तह पुधत्तं एयत्तं चावि तच्चण्हू ।।४७।। ज्ञानं धनं च करोति धनिनं यथा ज्ञानिनं च द्विविधाभ्याम् । भणंति तथा पृथक्त्वमेकत्वं चापि तत्त्वज्ञाः ।। ४७।। यथा धनं भिन्नास्तित्वनिर्वृत्तं भिन्नास्तित्वनिर्वृत्तस्य, भिन्नसंस्थानं भिन्नसंस्थानस्य, भिन्नसंख्यं पिनसंख्या , भिन्नतिपयलयनिक धिन्नतिषयलब्धवृत्तिकस्य पुरुषस्य धनीति व्यपदेशं पृथक्त्वप्रकारेण कुरुते, यथा च ज्ञानमभिन्नास्तित्वनिर्वृत्तमभिन्नास्तित्वनिर्वृत्तस्याभिन्नसंस्थानमभिन्नसंज्ञानस्याभिन्नसंख्यमभिन्नसंख्यस्याभिन्नविषयलब्धवृत्तिकमभिन्नविषयलब्धवृत्तिकस्य पुरुषस्य ज्ञानीति व्यपदेशमेकत्यप्रकारेण कुरुते, तथान्यत्रापि । यत्र द्रव्यस्य भेदेन व्यपदेशादिः तत्र पृथक्त्वं, यत्राभेदेन तत्रैकत्वमिति ।। ४७।। हिन्दी समय व्याख्या गाथा-४७ अन्वयार्थ— [ यथा ] जिस प्रकार [ धनं ] धन [च ] और [ज्ञानं ] ज्ञान [निनं ] [पुरुषको ] 'धनी' [च ] और [ ज्ञानिनं ] ज्ञानी [ करोति ] करते हैं..[ द्विविधाभ्याम भणति ] ऐसा दो प्रकारसे कहा जाता है, [ तथा ] उसी प्रकार [ तत्त्वज्ञाः ] तत्त्वज्ञ ( पृथक्त्वं ) [च अपि ] तथा [ एकत्वम् ] एकत्वको कहते हैं । टीका-यह, वस्तुरूपसे भेद और अभेदका उदाहरण है। जिस प्रकार ( १) भिन्न अस्तित्वसं रचित ( २ ) भिन्न संस्थानवाला (३) भिन्न संग्ल्यावाला और (४) भिन्न विषयमं आधार में स्थित ऐसा धन (१) भिन्न अस्तित्त्वसे रचित (२) भित्र संस्थानवाले (३) भिन्न संख्यावाले और (४) भिन्न विषयमें स्थित ऐसे पुरुषको 'धनी' एसा व्यपदेश पृथक्व प्रकारसे करता है, तथा जिस प्रकार (१) अभिन्न अस्तित्वसे रचित (२) अभिन्न संस्थानवाला (३) अभिन्न संख्यावाला और (४) अभिन्न विषयमें स्थित ऐसा ज्ञान (१) अभिन्न अस्तित्वसे रचित, (२) अभिन्न संस्थानवाले, (३) अभित्र संख्यावाले और (४) अभिन्न विषय में स्थित ऐसे पुरुष को 'ज्ञानी' ऐसा व्यपदेश एकत्त्वप्रकारसे करता है, उसी प्रकार अन्यत्र समझना चाहिये । जहाँ द्रव्यके भेदसे व्यपदेश आदि हों वहां पृथक्त्व है, जहाँ ( द्रत्यके ) अभेदमे ( व्यपदेश आदि ) हों वहाँ एकत्व है ।।४७।।
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy