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________________ षड्द्रव्य - पंचास्तिकायवर्णन हिन्दी तात्पर्यवृत्ति आगे प्रथम ही शास्त्रकी आदिमें “इन्द्रशतवन्दितेभ्यः" इत्यादि जिनेन्द्रको भाव नमस्कार रूप असाधारण मंगल कहूँगा ऐसा अभिप्राय मनमें धरकर आचार्य प्रथम सूत्र कहते हैं--- १० अन्वय सहित सामान्यार्थ - ( इंदसदबंदियाणं ) सौ इन्द्रोंसे वन्दनीक, ( तिहुअण-हिदमधुर - विसद-वक्काणं) तीन जगतको हितकारी मधुर और स्पष्ट वचन कहने वाले, ( अंतातीद- गुणाणं) अनंतगुणोंके धारी तथा (जिदभवाणं) संसारको जीतनेवाले ( जिणाणं ) अरहंतोंको ( णमो ) नमस्कार हो । विशेषार्थ - यहाँ के लिये को नमस्कार किया गया है । अरहंतोंके अनन्तज्ञान आदि गुणोंका स्मरण रूप भाव नमस्कार कहलाता है। सौ इन्द्रोंने अरहंतोंको नमस्कार किया - ऐसा कहनेसे अरहंतके पूज्यपने के माहात्म्यको प्रगट किया गया है तथा यह बताया है कि सौ इन्द्रोंसे नमस्कार करनेके योग्य ये ही अरहंत देव हैं और नहीं। श्री अरहंतके वचन शुद्धात्माके स्वरूपकी प्राप्तिका उपाय दिखलाने के कारणसे हित रूप हैं, वीतराग और विकल्परहित समाधिसे उत्पन्न जो स्वाभाविक अपूर्व परम आनन्द वही है निश्चय सुख उसके रसका स्वाद वही है परम समतारसमई भाव, उसके रसिक जो मनुष्य हैं उनके मनको मोहित करने वाले हैं, और वे स्पष्ट तथा व्यक्त हैं, क्योंकि उन वचनोंमें संशय-विमोह-विभ्रम नहीं है। यही सीप है या चाँदी है, ऐसे चंचल ज्ञानको संशय कहते हैं। पगमें तृणोंका स्पर्श होते हुए कुछ होगा ऐसे निश्चय करने की इच्छा न रखनेवाले भावको विमोह कहते हैं। सीपको चाँदी जान लेना सो विभ्रम है तथा वे वचन इसलिये भी स्पष्ट हैं, क्योंकि शुद्ध जीवास्तिकायको आदि लेकर सात तत्त्व, नव पदार्थ, छः द्रव्य और पाँच अस्तिकायका स्वरूप बतानेवाले हैं अथवा उन वचनों में पूर्वापर विरोध नहीं है इससे भी स्पष्ट है । अथवा अरहंतों की उस दिव्यध्वनिको सर्व जीव अपनी अपनी भाषा में सुनकर उससे स्पष्ट समझ जाते हैं। कर्णाटक, मागध, मालवा, लाट, गौड और गुर्जरइनमें प्रत्येकके तीन भेद, ऐसी १८ महाभाषा और सातसौ छोटी भाषाको आदि लेकर अनेक भाषाओंमें वह वाणी एक ही समयमें सबोंको सुनाई देती है, इससे भी वह विशद है । अरहंतकी वाणीके सम्बन्धमें ऐसा अन्य ग्रन्थमें कहा है सर्व आपत्तियोंसे रहित श्रीसर्वज्ञ भगवानका वह अपूर्व वचन हमारी रक्षा करे जो सर्व आत्माओंका हितकारी है अक्षर रूप नहीं है, दोनों ओठोंके हलन बिना प्रगट होता है, इच्छा रहित होता है, दोषोंसे मलीन नहीं है, न उसमें श्वासोच्छ्वासके रुकनेका क्रम है,
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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