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सातक
राय को पांच प्रकृतियां सम्मिलित है, मिथ्यात्व, अविरति, कषाय आदि कारणों के होने पर सभी जीवों को अवश्य बंधती हैं, इसीलिये इनको ध्रुवबन्धिनी प्रकृति मानते हैं।
आर भागेपी को गमागम मडासियों के नाम और बन्ध व उदय की अपेक्षा से प्रकृतियों के भंग बतलाते हैं। अबबंधी प्रकृतियां और बंध व स्वयं को अपेक्षा से प्रतियों के भग
तणवंगागिइसंघयण जाइगइखगइपुस्विजिणसास । उज्जोयायवपरचा तसवीसा गोय बणिय ॥ हासाइजुयलागवेग आउ तेवसरी अधुवबंधा। मंगा अणाइसाई अणंतसंस्तुतरा चउरो ॥४॥
शब्दार्थ-तगु–शरीर, (औदारिक, वैक्रिय, आहारक), जवंगा-तीन अंगोपांग, मागिह-छह संस्थान, संघयण छह संहनन, आइ-पांच जाति, गर-चार गसि, अगह-दो विहायोगति, पुग्वि–चार आनुपूर्वी, जिण -जिन नामकर्म, उसास - प्रवासोच्छवास नामकम, उम्सोय -उद्योत नामकर्म, आयष-आतप नामकर्म, परथा-पराधात नामकर्म, तसबोला-सादि बीस (त्रस दशक और स्यावर सगक), गोय-दो गोत्र, पणियं-दो वेदनीय ।
पंचसंग्रह और गो० कर्मकांड में प्रवदन्धिनी प्रकृतियों को इस प्रकार गिनाया हैनाणंतरायदसण धुवनंधि कसायमिछभयकुन्छा । अगुरुलधुनिमिणतेयं उबपायं वन चउकम्म ।
- पंचसंग्रह ३५ धाविति मि मछकसाया भयतेजगुरुद्धगणिमिण वण्णपओ । सत्तेताल वाणं............
-गो० कर्मकांस १२४