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________________ पंचम कमग्रन्थ २२१ काल उतना ही समझना चाहिये । क्योंकि उनके अवन्धकाल में ही इनका बन्ध हो सकता है। इस समयप्रमाण को इस प्रकार समझना चाहिए कि कोई जीव बाईस सागर प्रमाण स्थितिबंध करके छठे नरक में उत्पन्न हुआ. वहां पराधात आदि इन सात प्रकृतियों की प्रतिपक्षी प्रकृतियों का बन्ध न होने से इन सा प्रकृतियों का निरन्तर बच किया और अंतिम समय में सम्यक्त्व को प्राप्त करके मनुष्यगति में जन्म लिया । यहाँ अणुव्रतों का पालन करके चार पल्य की स्थिति वाले देवों में जन्म लिया और सम्यक्त्व सहित मरण करके पुनः मनुष्य हुआ और महावत धारण करके मरकर नौवें वेयक में इकतीस सागर की आयु वाला देव हुआ। वहां मिथ्याइष्टि होकर मरते समय पुनः सम्यक्त्व को प्राप्त करके मनुष्य हुआ । वहां से तीन बार मरमरकर अच्युत स्वर्ग में जन्म लिया और इस प्रकार छियासठ सागर पूर्ण किय । अन्तमुहूर्त के लिए तीसरे मिन गुणस्थान में आया और उसके बाद पुनः सम्यक्त्व प्राप्त किया और दो बार विजयादिक में जन्म लेकर छियासठ सागर पूर्ण किये । इस प्रकार छठे नरक वगैरह में भ्रमण करते हुए जीव को कहीं 'भवस्वभाव से और कहीं सम्यक्त्व के कारण पराधात आदि प्रकृतियों का बन्ध होता रहता है। शुभ विहायोगति, पुरुषवेद, सुभगत्रिक, उच्चगोत्र और समचतुरस्त्र संस्थान इन सात प्रकृतियों का उत्कृष्ट निरंतर बन्धकाल एकसौ बलीस' १ पंचसंग्रह को टीका में इन प्रकृतियों का निरन्तर बन्धकाल तीन पल्य अधिक एक सौ बत्तीस सागर बतलाया है । यहां कहा है कि तीन पत्य की आयु बाला निर्यच अशया मनुष्य भव के अंत में सम्यक्त्व' को प्राप्त करके पहले वतार ने ऋम से १३२ सागर तक संसार में भ्रमण करता है।
SR No.090243
Book TitleKarmagrantha Part 5
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages491
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size8 MB
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