SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 256
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ पंचम कमग्रन्थ २१६ अर्सख्यात उत्सर्पिणी, अवसपिणी वतलाया है। सातवें नरक में भी इन तीन प्रकृतियों का निरन्तर बन्ध होता रहता है। आयुकर्म की चारों प्रकृतियों- नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देवायु का जघन्य और सट बाल तन है... उनान्हू । क्योंकि आयुकर्म का एक भव में एक ही बार बंध होता है और वह भी अधिक-से-अधिक अन्तर्मुहूर्त तक होता रहता है । औदारिक शरीर नामकर्म का एक समत्र से लेकर उत्कृष्ट बन्ध काल असंख्यात पुद्गल परावर्त है । क्योंकि जीव एक समय तक औदा. रिक शरीर का बन्ध करके दुसरे समय में उसके विपक्षी बैक्रिय शरीर आदि का भी बन्ध कर सकता है तथा असंख्यात पुदगल परावर्त का समय इसलिए माना जाता है कि स्थावरकाय में जन्म लेने वाला जीव असंख्यात पुद्गल परावर्त काल तक स्थावरकाय में पड़ा रह सकता है । तब उसके औदारिक के सिवाय अन्य किसी भी शरीर का बन्ध नहीं होता है। 'सायठिई पुब्बकोडूणा' साता वेदनीय का उत्कृष्ट बन्धकाल कुछ कम एक पूर्व कोदि है। जब कोई जीव एक समय तक साता बेदनीय का बन्ध करके दूसरे समय में उसकी प्रतिपक्षी असाता बेदनीय का बन्ध करता है तब तो उसका काल एक समय ठहरता है और जब कोई कर्मभूमिज मनुष्य आठ वर्ष की उम्र के पश्चात जिन दीक्षा धारण करके केवलज्ञान प्राप्त कर लेता है तब उसके कुछ अधिक आठ वर्ष कम एक पूर्व कोटि काल तक निरन्तर साता बेदनीय का बंध होता रहता है। क्योंकि छठे गुणस्थान के बाद साता वेदनीय की विरोधिनी असाता वेदनीय प्रकृति का बन्ध नहीं होता है तथा कर्मभूमिज मनुष्य की उत्कृष्ट आयु एक पूर्व कोटि को होती है, अतः
SR No.090243
Book TitleKarmagrantha Part 5
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages491
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size8 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy