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________________ २१ शतक संहनन और औदारिक अंगोपांग नामकर्म का तेतीस सागरोपम उत्कृष्ट सतत बंध होता है । चार आयु और तीर्थकर नामकर्म का जघन्य निरंतर बंध भी अन्तमुहूर्त होता है । विशेषाध- - इन चार गाथाओं में अध्रुवबंधिनी प्रकृतियों के नाम तथा उनके निरंतर बन्ध होने के उत्कृष्ट समय को बतलाया है । इन प्रकृतियों के निरंतर बन्ध होने के जघन्य समय का संकेत इसलिये नहीं किया है क्योंकि अध्रुवबन्धिनी होने से एक समय के बाद भी इनका बना ल मकता। सभी प्रकृतियों का निरंतर बन्धकाल समान नहीं होने से समान समय बाली प्रकृतियों के वर्ग बनाकर उन-उन के बन्ध का समय बतलाया है । जिनका स्पष्टीकरण नीचे किये जा रहा है । तिर्यंचद्रिक (तिर्यंचगति, तिर्यंचानुपूर्वी) और नीच गोन का बन्धकाल एक समय से लेकर असंख्यात काल हो सकता है - समयादसंखकालं तिरिदुगनीएस । इसका कारण यह है कि उक्त तीन प्रकृत तियां जघन्य से एक समय तक बंधती हैं, क्योंकि दूसरे समय में इनकी विपक्षी प्रकुतियों का बन्ध हो सकता है । किन्तु जब कोई जीव तेजस्काय और वायुकाव में जन्म लेता है तो उसके तियंचद्विक व नीच गोत्र का निरंतर बन्ध होता रहता है,जब तक वह उस कार्य में बना रहता है । तेजस्काय और वायुकाय के जीवों में तिर्यचद्विक के सिवाय अन्य किसी गति और आनुपूर्वी का बन्ध नहीं होता और न उच्च गोत्र का ही । तेजस्काय ब वायुकाय में जन्म लेने वाला जीव लोकाकाश के असंख्यात प्रदेश होते हैं, अधिक-से-अधिक उलने समय तक बराबर तेजस्वाय व बायुकाय में जन्म लेता रहता है | इसीलिए इन तीन प्रकृतियों का उत्कृष्ट निरन्तर बन्धकाल असंख्यात समय अर्थात्
SR No.090243
Book TitleKarmagrantha Part 5
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages491
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size8 MB
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