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________________ १२० शतक कालमर्यादा को उत्कृष्ट स्थिति और न्यूनतम कालमर्यादा को जघन्य स्थिति कहते हैं। ऊपर कही गई दोनों गाथाओं में ज्ञानावरण आदि आठ कर्मों को उत्कृष्ट और जघन्य स्थिति बतलाई है। इस उत्कृष्ट और जघन्य स्थिति के बीच जीवों की अध्यवसाययोग्यता से मध्यम स्थितियों के अनेक प्रकार हो जाते हैं । ___ज्ञानावरण आदि आठ कर्मों की जो उत्कुष्ट स्थिति बतलाई है, वह इतनी अधिक है कि संख्या प्रमाण के द्वारा उसका बतलाना अशक्यसा है, अतः उसे उपमा प्रमाण के एक भेद सागरोपम द्वारा बतलाया गया है तथा एक करोड़ को एक करोड़ से गुणा करने पर जो राशि आती है उसे कोडाकोड़ी कहते हैं । आयुकर्म को छोड़कर शेष सात कर्मों की कोड़ाकोड़ी सागरोपमों के द्वारा उत्कृष्ट स्थिति बतलाई है । ____ आयुकम ही एक ऐसा कर्म है जिसकी स्थिति कोड़ाकोड़ी सागरेपम में नहीं किन्तु मिफ सागरोपम में बताई है । साथ ही आधुकर्म की उत्कृष्ट स्थिति बतलाने के बारे में यह भी विशेषता रखी है कि उसके दो भेदों--नरकाय और देवायु की भी उत्कट स्थिति बतला दी गई है। इसका कारण यह है कि मूल आयुकर्म की जो उत्कृष्ट स्थिति है, वही उत्कृष्ट स्थिति नरकायु और देवायु की भी है । अतः ग्रन्थलाधव की दृष्टि से मूल आयुकर्म को उत्कृष्ट स्थिति को अलग से न बतलाकर दो उत्तर प्रकृतियों के द्वारा उसकी तथा उसको दो उत्तर प्रकृतियों की भी उत्कृष्ट स्थिति बतला दी है। ___ कषायों का उदय दसवें सूक्ष्मसंपराय गुणस्थान तक ही होता है, अतः वहाँ तक कमो के स्थितिबन्ध की स्थिति है और दसवें गुणस्थान तक के जीव सकषाय और ग्यारहवें से चौदहवे-उपशान्तमोह, क्षीणमोह, सघोमिकेवली, अयोगिकेवली गुणस्थान तक के जीव अकपाय कहे जाते हैं । आठ कर्मों में से एक वेदनीय कर्म ही ऐसा है जो
SR No.090243
Book TitleKarmagrantha Part 5
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages491
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size8 MB
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