________________
कर्मग्रन्थ भाग चार
जब उसने लेश्या में भरते हैं और बादर पृथिवीकाय, जलकाय या वनस्पतिकाय में जन्म लेते हैं, तब उन्हें अपर्याप्त अवस्था में तेजोलेश्या होती है। यह नियम ही है कि जिस लेश्या में मरण हो, जनमते समय वही लेइपा होती है।
अपर्याप्त तथा पर्याप्त सूक्ष्म एकेन्द्रिय आदि उपर्युक्त ग्यारह जीव स्थानों में तीन लेश्यायें कही गई है। इसका कारण यह है कि वे सब जीवस्थान, अशुभ परिणाम वाले ही होते हैं इसलिये उनमें शुभ परिणामरूप पिछली तीन लेश्यायें नहीं होती ।
इस जगह जीवस्थानों में बन्ध, उदीरणा, सत्ता और उदय का जो विचार किया गया है, वह मूल प्रकृतियों को लेकर । प्रत्येक जीवस्थान में किसी एक समय में मूल आठ प्रकृतियों में से कितनी प्रकृतियों का बन्ध, कितनी प्रकृतियों की उदीरणा, कितनी प्रकृतियों को सत्ता और कितनी प्रकृतियों का उदय पाया जा सकता है, उसी को दिखाया है १. बन्ध ।
पर्याप्त संज्ञि के सिवाय सब प्रकार के जीव, प्रत्येक समय में आयु को छोड़कर सात कर्मप्रकृतियों को बांधते रहते हैं। आठ कर्मप्रकृतियों को ये तभी से हैं, जबकि आयु का बन्ध करते हैं। आयु का बन्ध एक भव में एक ही बार जघन्य या उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त तक ही होता है । आयुकर्म के लिये यह नियम है कि वर्तमान आयु का तीसरा, नयाँ
१ – इसका उल्लेख इस प्रकार मिलता है: "जल्ले से मरइ, तल्लेसे उबवज्जद" । इति
२५
――
I
२-- उक्त नियम सोपक्रम (अपवर्त्य घट सकने वाली ) आयु वाले जीवों को लागू पड़ता है, निरुपक्रम आयु वालों को नहीं ने यदि देव नारक या असंख्य मनुष्य तिर्यञ्च हों तो यह महीने आयु बाकी रहने पर ही परभबकी आयु बांधते हैं और यदि एकेन्द्रिय, विकलेन्द्रिय या पञ्चेन्द्रिय मनुष्य-तियंञ्च हों तो वर्तमान भाव का तीसरा भाग शेष रहने पर ही आयु बचते हैं।
-- बृहत्संग्रहणी, गा० ३२१-३२३, तथा पञ्चम कर्मग्रन्थ, गा० ३४ ।