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________________ हमें और औरहवें गुणस्थान में होता है । सम्प्रज्ञातयोग अध्यात्मसे लेकर ध्यान पर्यन्त के चारों मेहस्वरूप है और असम्प्रभातयोग पृतिसंक्षयरूप है। इसलिये छौथे से बारहवें गुणस्थान तक में सम्प्रशातयोग और तेरहवें -धौरहवें गुणस्थान में असम्प्रतियोग समाना चाहिए । *"शुक्लपक्षेन्दुवत्प्रायो, वर्धमानगुणः स्मृतः । भवाभिनन्दिदोपाणा, मपुनर्बन्धको व्यये ॥ १॥ अस्यैव पूर्वसेवोक्ता, मुस्थाऽन्यस्योपचारतः । अस्यावस्थान्तर मार्ग, पतिताभिमुखो पुनः ।। २ ।।" --अपुनर्बन्धकद्वात्रिशिका । "अपुनर्बन्धकस्यायं, व्यवहारेण तात्त्विक: अध्यात्मभावनारूपो, निश्चयेनोत्तरस्य तु ॥१४।। सदावर्तनादीना, मतात्त्विक उदाहृतः । प्रत्यपायफलप्राय, स्तथा वेषादिमात्रतः ॥१५॥ शुद्ध रपेक्षा यथायोग, चारित्रवत्त एव च । हन्त ध्यानादिको योग, स्तात्त्विकः प्रविजृम्भते ॥१६॥" -योगविवेकद्वात्रिक्षिका । संप्रशातोऽवतरति, ध्यानभेदेऽत्र तत्त्वत: । तात्त्विकी च समापत्ति, त्मिनो भाव्यतां विना ॥१५॥ असम्प्रज्ञात नामा तु, संमतो वृत्तिसंक्षयः ॥ सर्वतोभ्मादकरण,-नियमः पापगोचरः ॥२१॥" -योगावतारद्वानिशिका।
SR No.090242
Book TitleKarmagrantha Part 4
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages363
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size5 MB
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