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________________ ३३ --- वाशिष्ठ में * तथा पातञ्जलयोग सूत्र 1 में अज्ञानो लोग का वही लक्षण है । जैनशास्त्र में मिध्यात्वमोहमोथ का संसार वृद्धि और नुःवरूप पॉल मणित योगवाशिष्ट है । मात "आत्मश्रिया समुपात, कायादिः कीर्त्यतेऽत्र बहिरात्मा । कायादेः समधिष्ठायको भवस्यन्तरात्मा तु ॥७॥" ' - योगशास्त्र, प्रकाश १२ । " निर्मलस्फटिकस्येव, सहजं रूपमात्मनः । अध्यस्तोपाधिसंबन्धो, जडस्तत्र विमुह्यति ॥६॥ -- ज्ञानसार, मोहाष्टक | "नित्य शुच्यात्मताख्याति रनिरयाशुच्यनात्मसु । अविद्यातत्त्वविद्या योगाचार्यः प्रकीतिताः ॥७॥ -- ज्ञानसार, विद्याष्टक | मच्छावा तदीक्षणम् श्रमदाटी बहिदेखि अभ्रान्तस्तत्त्वदृष्टिस्तु, नास्यां शेते सुखाऽऽशया ॥ २ ॥" - निसार, तस्वष्टि- अष्टक | J * यस्याज्ञानात्मनोशस्य देह एषात्मभावना उदितेति वाक्ष, रिपवोऽभिभवन्ति तम् ॥३॥ " — निर्माण प्रकरण, पूर्वार्ध, सगं ६ । "अनित्याऽशु दुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मस्यातिरविद्या ।" - पातञ्जलयोगसूत्र, साधन-याद, सूत्र ५ । + समुदायावयवयोन्धहेतुत्वं वाक्यपरिसमाप्ते विश्यात् ।" - तस्वार्थ, अध्याय ६ सू० १, बात्तिक ३१ । "विकल्प परात्मा, पीतमोहासवां ह्ययम् । मवोच्चतालमुसाल, प्रपञ्चमधितिष्ठति ॥४॥" ક્ --- ज्ञानसार, मोहाष्टक |
SR No.090242
Book TitleKarmagrantha Part 4
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages363
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size5 MB
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