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________________ नामंग्रन्थ भाग चार बोलने तथा सुनने की शक्ति नहोने पर मी एकेन्द्रिय में भूत-उपयोग स्वीकार किया जाता है, सो किस तरह ? इस पर विचार । पु.-४५ । पुरुष व्यक्ति में स्त्री-योग्य और स्त्री व्यक्ति में पुरुष-योग्य भाव पाये जाते हैं और कभी तो किमी एक हो व्यक्ति में स्त्री-पुरुष रोगों के बाह्याभ्यन्तर लक्षण होते हैं। इसके विश्वस्त सवत । पृ.-५३, नोट । श्रावकों की वर" का विस्था नहीं की है, उसका खुलासा । १०-६१, नोट। मन:पर्याय उपयोग को कोई आचार्य पर्शनरूप भी मानते है, इसका प्रमाण । ५० ६२, नोट । जाति मध्य किसको कहते हैं ? इसका खुलासा | पृ०-६५, नोट | औपमिकसम्यक्तत्र में वो जीयस्थान मानने वाले और एक जीवस्थान मानने वाले माचार्य अपने-अपने पक्ष की पुष्टि के लिये अपर्याप्त-अवस्था में औपशमिकसभ्यक्तब पाये जाने और न पाये जाने के विषय में क्या क्या युक्ति देते हैं ? इसका सविस्तर वर्णन । पुर-७०, नोट। समूचिछम मनुष्यों की उत्पत्ति के क्षेत्र और स्याम तथा उनकी आयु और योग्यता जानने के लिये आगमिक-प्रमाण । पृ०-७, भोट । स्वर्ग से छयुत होकर वेव किन स्थानों में पैदा होते है ? इसका कथन । पृ० ---७३. नोट । घाईर्शन में कोई तीन हो जीवस्थान मानते हैं और कोई छ । यह मत-मेव इन्द्रियपर्याप्ति की भिन्न-भिन्न व्याख्याओं पर निर्भर है। इसका सप्रमाण कथन । पु०-७६, नोट । फर्मग्रन्य में असंज्ञो पञ्चेन्द्रिय को स्त्री और पुरुष, ये बो देव
SR No.090242
Book TitleKarmagrantha Part 4
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages363
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size5 MB
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