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________________ २४२ क्रर्मग्रन्थ भाग चार परिशिष्ट नं० ४ । कुछ ध्यान देने योग्य विशेष- विशेष स्थल | जीवस्थान, मार्गणास्थान और गुणस्थान का पारस्परिक अस्तर | पूँ० - ४ । परभव की आयु बाँधने का समय विभाग अधिकारी-क्षेत्र के अनुसाथ किस दिशा का है। पु०-२४ नोट | उदीरणा किस प्रकार के कर्म की होती है और वह कब तक हो सकती है ? इस विषय का नियम । पृ०-२६, नोट | व्य-लेवा के स्वरूप के सम्बन्ध में बाशय क्या है ? मावलेश्या क्या वस्तु है दर्शन में तथा गोशालक के मत में लेश्या के इत्यादि का विचार । पृ०-३३ कितने पक्ष हैं ? उन सबका और महाभारत में योग, स्थान में कैसी कल्पना है ? J शास्त्र में एकेन्द्रिय द्वीन्द्रिय आदि जो इन्द्रिय सापेक्ष प्राणियों का विभाग है वह किस अपेक्षा से ? तथा इत्रिय के कितने मेव प्रमेव है और उनका क्या स्वरूप है ? इत्यादि का विचार । पृ० ३६ । संज्ञा का तथा उसके मेव प्रभेदों का स्वरूप और संज्ञित्व तथा असंत्वि के व्यवहार का नियामक क्या है ? इत्यादि पर विचार पृ० ३८ । अपर्याप्त तथा पर्याप्त और उसके मेव आदि का स्वरुप तथा पर्याप्ति का स्वरूप पृ०-४० । केवल शरम तथा केवलवन के क्रमभाषित्व, सहमाथित्व और अमेव इन तीन पक्षों को मुख्य-मुख्य बलीले तथा उक्त तीन पक्ष | किस-किस नयको अपेक्षा से है ? इत्यादि का वर्णन । दृ०-४३
SR No.090242
Book TitleKarmagrantha Part 4
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages363
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size5 MB
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