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________________ समग्रन्ध भाग चार રા आदि संज्ञाओं का विस्तृत वर्णम है, पर दिगम्बर-अन्यों में नहीं है । पृ०-१६ श्वेताम्बर-शास्त्र प्रसिद्ध करणपर्याप्त शष्य के स्थान में विगम्यरशास्त्र में नित्यपर्याप्त शब्द है। ध्याल्या भी दोनो शब्दो की कुछ भित है। पृ०-४१। श्वेताम्बर-मन्थो में केवलज्ञान तथा केथलदर्शन का कमावित्व, सहमाविश्व और अमेव, ये तीन पक्ष हैं, परन्तु दिगम्बर-मन्थो में सहभारित्व का एक ही पक्ष है। पृ०-४३ । लेश्या तथा आयु के बन्धाबन्ध को अपेक्षा से कषाय के जो चौमह और बोस भेद गोम्मटसार में हैं, वे श्वेताम्बर-मन्यो में नहीं देखे पये | पृ -- ५५, नोट । अपर्याप्त-अवस्था में औपशमिकसम्मक्तव पाये जाने और न पाये जाने के सम्बन्ध में दो पक्ष श्वेताम्बर-प्राथो में है, परन्तु गोम्मरसार में उक्त वो में से पहिला पक्ष ही है। पृ०-७०, चोट । अज्ञान-त्रिक में गणस्थानो की संख्या के सम्बन्ध में बो पक्ष फर्मप्रन्थ में मिलते हैं, परन्तु गोम्मरसार में एक ही पक्ष है । पृ०-८२, नोट गोम्मटसार में नारको की संख्या कर्मप्रन्थ-वणित संख्या से भिन्न छ। पृ० - ११६, नोट। यमन का आकार तथा स्थान दिगम्बर संप्रदाय में श्वेताम्बर को अपेक्षा भिन्न प्रकार का माना है और तीन योगो के बाहाभ्यन्सर कारणो का वर्णन राजवातिक में बहुत स्पष्ट किया है । पृ०-१३४ । मनःपर्यापमान के योगो की संख्या दोनो सम्प्रवाय में तुल्य नहीं है। पृ०-१५४ ।
SR No.090242
Book TitleKarmagrantha Part 4
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages363
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size5 MB
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