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________________ कर्मग्रन्थ माग चा २३६ वो पक्ष श्वेताम्बर-ग्रन्थों में हैं, विगम्बर-प्रन्थों में भी हैं। पृ० - १७१. मोट । श्वेताम्बर - प्रन्थों में जो कहीं कर्मबन्ध के पार हेतु कहीं वो हेतु और कहीं पाँच हेतु कहे हुए हैं; दिगम्बर-ग्रन्थों में मो वे सब वर्णित हैं। पृ०-१७४, लोट | बन्ध-हेतुओं के उत्तर मेव आदि दोन संप्रवाप में समान है । पृ० - १७५, नोट । सामान्य तथा विशेष बन्ध-हेतुओं का विकार दोनों संप्रदाय प्रत्यों में है । पृ०-१८१, नोट । एक संख्या के अर्थ में रूप शब्द दोनों सम्प्रदाय के ग्रन्थों में मिलता है। पृ० - २१८ नोट कर्मग्रन्थ में वर्णित वस तथा छह क्षेत्र त्रिलोकसार में भी हैं पृ०-२२१, नोट । उत्तर प्रकृतियों के भूल बम्ध हेतु का विचार जो सर्वार्थसिद्धि में है, वह पञ्चसंग्रह में किये हुए विचार से कुछ मिला होने पर भी वस्तुत: उसके समान ही है । पृ० - २२७ । कर्मग्रन्थ तथा पञ्चसंग्रह में एक-जीवाश्रित भावों का जो विचार है, गोम्मटसार में बहुत अंशो में उसके समान हो वर्णन है । पृ० २२६ । - ( ख ) इतर-ग्रन्थों में तेजःकस्य को वैक्रिय शरीर का कथन नहीं है, पर दिगम्बरन्थों में है । पृ० १६ नोट J श्वेताम्बर संप्रदाय की अपेक्षा दिगम्बर संप्रदाय में संज्ञि असंजी का वह कुछ मिल हैं। तथा श्वेताम्बर धन्यों में हेतुभावोपदेशिकी
SR No.090242
Book TitleKarmagrantha Part 4
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages363
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size5 MB
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