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________________ — भी होते हैं जो करोब करीब ग्रन्थिभेद करने लायक बल प्रकट करके भी अन्त में राग-द्वेष के तीव्र प्रहारों से आहत होकर व उनसे हार खाकर अपनी मूल स्थिति में आ जाते है और अनेक बार प्रयत्म करने पर भी रागद्वेब पर नहीं ऐसे भी होते हैं, जो न तो हार खाकर पीछे गिरते है और न जय लाभ कर पाते हैं, किन्तु वे चिरकाल तक उस आध्यात्मिक युद्ध के मंत्राम में ही पड़े रहते हैं । कोई-कोई आत्मा ऐसा भी होता है जो अपनी शक्ति का यथोचित प्रयोग करके उस आध्यात्मिक युद्ध में रागद्वेष पर जयलाभ कर हो लेता है । किसी भी मानसिक विकार को प्रतिद्वन्द्विता में इन तीनों अवस्थाओं का अर्थात् कभी हार खाकर पोछे गिरने का कभी प्रतिस्पर्धा में डटे रहने का और जयलाम करने का अनुभव हमें अकसर नित्य प्रति हुआ करता है। यही संघर्ष कहलाता है। संघर्ष विकास का कारण है। चाहे विद्या, चाहे बन चाहे कोलि, कोई भी लौकिक वस्तु इष्ट हो, उसको प्राप्त करते समय भी मानक अनेक विघ्न उपस्थित होते हैं और उनको प्रतिद्वन्द्विता में उक्त प्रकार की तीनों अवस्थाओंों का अनुभव प्राय: सबको होता रहता है। कोई विद्यार्थी, कोइ धनार्थों या कोई कोतिकाड.क्षी जब अपने इष्ट के लिये प्रयत्न करता है। तब या तो वह ate में अनेक कठिनाइयों को देखकर प्रयत्न को छोड़ ही देता है या कठिनाइयों को पार कर इष्ट प्राप्ति के मार्ग की और अग्रसर होता है । जो अग्रसर होता है, वह बड़ा बिसूरन बड़ा धनवान् या बड़ा कीर्तिशाली बन जाता है । जो कठिनाइयों से डरकर पीछे भागता है, बहू पामर, अज्ञान, निर्धन या कीतिहीन बना रहता है । और जो न कठिनाइयों को जीत सकता है और न उनसे हार मानकर पीछे भागता है, वह साधारण स्थिति में हो पड़ा रहकर कोई ध्यान खींचने योग्य उत्कर्ष -लाभ नहीं करता |
SR No.090242
Book TitleKarmagrantha Part 4
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages363
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size5 MB
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