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________________ ४४ कर्मग्रन्थ भाग चार ३---(क) जैसे सामग्री मिलनेपर एक शान-पर्याय में अनेक घट-पटादि विषय भासित होते हैं, बसे ही आवरण-क्षय, विषय आदि सामग्री मिलने पर एफ ही केवल-उपयोग, पदार्थोके सामान्यविशेष उभय स्वरूपक जान सकता है। खजसे केवलज्ञान के समय,मतिज्ञानावरणादिका अभाव होनेपर भी मति आदि जान, केवलज्ञानसे अलग नहीं माने जाते, वैसे ही केवल दर्शना-वरणका क्षय होने । पर मी केवलदर्शनकों, केवलज्ञानसे अलग मानना उचित नहीं। (ग)विषय और क्षयोपशमतकी विभिन्नताके मारण, छानस्थिक ज्ञान और दर्शन में परस्पर भेद माना जा सकता है, पर अनन्त-विषयकता और क्षायिक-भाव समान होने से केोवत्रज्ञान केवलदर्शन में किसी तरह भेद नहीं माना जा सकता। (घ) यदि केबल दर्शनको केवलज्ञानसे अलग माना जाय तो वह सामान्यमात्रको विषय करने वाला होनेसे अल्पविषयकसिद्ध होगा, जिससे उसकाशास्त्रकथितअनन्त-विषयकत्व नहीं घट सकेगा । (ड:) कालोका भाषण, सावलशान साम-दुर्वर होता है, मह शास्त्र-कथन अभेद-पक्षहीम पूर्णतया घट सकता है । (च) आवरण-भेद कथञ्चित है; अर्थात् वस्तुत: आवरण एक होने पर भी कार्य और उपाधि-भेदकी अपेक्षा से उसके भेद समझने चाहिये इस लिये एक उपयोग-व्यक्तिमें ज्ञानत्व दश नत्व दो धर्म अलग-अलग मानना चाहिये । उपयोग, ज्ञान-दर्शन दो अलग-अलग मानना युक्त नहीं; अत एवं ज्ञान-दर्शन दोनों शब्द पर्यायमात्र एकार्थवाधी) हैं। उपाध्याय श्रीयशोविजयजीने अपने ज्ञानबिन्दु प०११४ में नयी-दुष्टि से तीनों पक्षों का समन्वय किया है:-सिद्धान्त-पक्ष,शुद्ध ऋजसुत्रनयकी अपेक्षा से; श्रीमत्लवादी जी का पक्ष, व्यवहार-मयकी अपेक्षा से और श्रीसिद्धसेन दिवाकरका पक्ष, संग्रहनयकी अपेक्षा से जानना चाहिये। इस' विषयका सविस्तर वर्णन, सम्मतितर्क; जीवकाण्ड मा. ३ से आगे; विशेषावश्यक माण्य गा० ३०८८-३१३५, श्रीहरिभद्रगरिकृत धर्मसंग्रहणी गा० १३३६-१३५६, श्रीसिद्धसेनगणिकृत तत्वार्थटीका अ० १, सू० ३१, प. श्रीमलयगिरि-नन्दीवृत्ति १० १३४-१३८ और मानबिन्दु प०१५४-१६४ से जान लेना चाहिये । 'दिगम्बर-सम्प्रदाय में उक्त तीन पक्ष में से दुसरा अर्थात् उपयोग-जयका पक्ष ही प्रसिद्ध है: जगवं वदणाणं, केवलजाणिस्स बसणं च तहा। विणयरपयासतापं, जह पट्टई तह मुणेघवं ॥१६॥" -नियमसार । "सिद्धाणं सिद्धगई, केबलणाणं च बंसगं खयियं । सम्म समणाहार, उपजोगाणरकमपउत्ती ॥७३०॥" -जीवकाण्ठ । "बसणपुवं जाणं, छदमस्थाणं ण वोण्णि उपजग्गा। गर्व सम्हा केवलि–णाहे झुग तु ते धो वि ॥४४॥" - द्रश्यसंग्रह ।
SR No.090242
Book TitleKarmagrantha Part 4
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages363
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size5 MB
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