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________________ कर्मग्रन्थ भाग चार ૪૨ परिशिष्ट "" पृष्ठ २१ के क्रम मावों शब्द पर छभस्थ के उपयोग कमभावी हैं, इसमें मतभेद नहीं है, पर केवली के उपयोग के सम्बन्ध में मुख्य तीन पक्ष है: (१) सिद्धान्त- पक्ष, केवलज्ञान और केवलदर्शनको कमभावी मानता है इसके समर्थक श्रीजिनभद्रगणि क्षमाश्रमण आदि हैं । (२) दूसरा पक्ष, केवलज्ञान- केवलदर्शन, उभय उपयोगको सहभावी मानता है । इसके पोषक श्रीमल्लवादी तार्किक आदि हैं। (तीसरा पक्ष उभय उपयोगोंका भेद न मानकर उनका ऐक्यमानता हैं। इसके स्थापक श्रीसिद्धसेन दिवाकर है। तीनों पक्षोंकी कुछ मुख्य-मुख्य दलीलें क्रमशः नीचे दी जाती हैं: - १ (क) सिद्धान्त (नगवती- शतक १८ और २५ के ६ उद्देश, तथा प्रज्ञापना-पद ३० ) में ज्ञान दर्शन दोनोंका अलग-अलग कथन है तथा उनका क्रम मावित्व स्पष्ट वर्णित है । ख) नियुक्ति | आ०नि०गा० २७७-९७६। में केवल ज्ञान- केवलदर्शन दोनोंका भिन्न-भिन्न लक्षण उनके द्वारा सर्व विषयक ज्ञान तथा दर्शनका होना और युगपत् दो उपयोगों का निषेध स्पष्ट बतलाया है। (ग) केवल ज्ञान- केवलदर्शन के भिन्न-भिन्न आवरण और उपयोगोंकी बारह संख्या शास्त्र में (प्रज्ञापना २६०३५ आदिमें जगह-जगह वर्णित है । (घ) केवलज्ञान और केवलदर्शन, अनन्त कहे जाते हैं, सो लब्धिको अपेक्षा से उपयोग की अपेक्षा से नहीं । उपयोगकी अपेक्षा से उनकी स्थिति एक समयकी है; क्योंकि उपयोगकी अपेक्षा से अनन्तता शास्त्रम नाही भी प्रतिपादित नहीं है । (ङ) उपयोगों का स्वभाव ही ऐसा है, जिससे कि वे क्रमशः प्रवृत्त होते हैं। इसलिये केवलज्ञान और केवलदर्शनको क्रमभावी और अलग-अलग मानना चाहिये । · २ (क) आवरण-क्षयरूप निमित्त और सामान्य विशेषात्मक विषय, समकालीन होने से केवलज्ञान और केवलदर्शन युगपत् होते हैं । ख) लायस्थिक उपयोगों में कार्यकारण भाव या पररपर प्रतिबन्ध्य-प्रतिबन्धक भाव घट सकता है. ज्ञायिक उपयोगों में नहीं; क्योंकि बोध-स्वभाव शरश्वत आत्मा, जब निरावरण हो, तब उसके दोनों क्षायिक उपयोग निरन्तर ही होने चाहिये । (ग) केवलज्ञान केवलदर्शनकी सादि-अपर्यवसितता, जो शास्त्र में कही है, वह भी युगपतृ पक्ष में ही घट सकती है; क्योंकि इस पक्ष में दोनों उपयोग युगपत् और निरन्तर होते रहते हैं। इसलिये द्रव्यार्थिकनयसे उपयोग-दुबके प्रवाहको अपर्यवसित (अनन्त) कहा जा सकता है। (घ) केवलज्ञान- केवलदर्शन के सम्बन्ध में सिद्धान्त में जहकहीं जो कुछ कहा गया है, वह सब दोनोंके व्यक्ति-भेदका साधक है, तमा वित्व का नहीं। इस लिये दोनों उपयोगको सहभावी मानना चाहिये ।
SR No.090242
Book TitleKarmagrantha Part 4
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages363
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size5 MB
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