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________________ प्रध-संग्रह प्र-संक्षेप से भावास्रव के कितने भेद है? ३०-संक्षेप से भावासब के पांच भेद हैं-मिथ्यात्व, अविरति, प्रपाक, योग और कषाय। प्र-विस्तार से भावानव के भेद बताइये।। उ०-विस्तार से ३२ भेद है-५ मिष्यात्व, ५ अविरति, १५ प्रमाद, ३ योग, ४ कषाय = ३२। प्र-मिथ्यात्व किसे कहते हैं ? इसमें पांच भेद कौन से हैं ! 3०-तत्व का प्रदान नहीं होना मिथ्यात्व कहलाता है। इसके पांच भेद-एकांत, विपरीत, संशय, वेनयिक एवं अज्ञान। प्र०-एकान्त मिथ्यात्व का स्वरूप बताइये ।। -अनेक धस्मिक वस्तु में यह इसी प्रकार है, इस प्रकार के एकान्त अभिप्राय को एकान्त मिथ्यात्व कहते हैं। जैसे वस्तु निस्य भी है बीर अनित्य भी है किन्तु कोई ( बौख) मतवाले वस्तु को अनिस्य हो मानते हैं तथा कोई ( वेदान्तो) सर्वथा निय ही मानते हैं। { अन्तधर्म, गुण)। प्र-विपरोत मिथ्यात्व किसे कहते हैं। ३०-उल्टे श्रद्धान को विपरीत मिथ्यारव कहते हैं। जैसे-केवलो के कवलाहार होता है, परिग्रह सहित भो गुरु हो सकता है तथा स्त्रो को भो मोक्ष प्राप्त हो सकता है आदि । प्र०-संशय मिथ्यात्व का लक्षण बताओ? उ.-चलायमान श्रद्धान को संशय मिथ्यात्व कहते हैं। जैसेअहिंसा में धर्म है या नहीं, सम्यक्दर्शन, सम्यक्झान, व सम्पचारित्रये मोक्ष के मार्ग है या नहीं।। प्रा-वेनयिक मिथ्यात्व किसे कहते हैं ? उम्-सभी प्रकार के देवसरागो-बोतरागी, सभी प्रकार के गुरुपरिग्रहरहित-परिग्रहसहित एवं सभी प्रकार के मतों को समान मानना पेनयिक मिथ्यात्व है। प्र-अज्ञान मिथ्यास्त्र का लक्षण बताइये। उ०-हिताहित को परीक्षा न करके प्रदान करना अझान मिव्याख प्रा-अविरति किसे कहते हैं, उसके ५ भेद कौन से हैं ? २०-पांच पापों से विरत (स्याग ) नहीं होना अविरति है। उसके
SR No.090157
Book TitleDravyasangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size1 MB
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