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________________ द्रव्य संग्रह लोकाकाश और अलोकाकापा का स्वरूप धम्मा-धम्मा कालो, पुग्गलजीया य संसि आवविये । आयासे सो लोगो, तत्तो परदो अलोगुत्तो ॥२०॥ 2 अम्बयार्थ— ( जावदिये ) जितने । ( आयासे ) आकाश में। ( धम्माधम्मा ) धर्म और अधर्म । (कालो) काल (य) और ( पुग्गलजीया ) पुद्गल तथा जोब द्रव्य । ( संति ) हैं ( सो ) वह । (लोगो) लोकाकाश है । ( तत्तो परदो) उससे बाहर । ( अलोगुत्ती ) अलोकाकाश कहा गया है । अर्थ जितने आकाश में जीव, पुद्गल, धर्म, अधमं, आकाश और काल हैं वह लोकाकाश व उससे बाहर अलोकाकाश कहा गया है। प्र० लोक किसे कहते हैं ? ४०-जीब और अजीव द्रव्य जिसने आकाश में पाये जाये उतने आकाश को लोक कहते हैं । प्र०-अलोक किसे कहते हैं । उ०- लोक के बाहर केवल आकाश ही आकाश है । जहाँ अन्य द्रव्यों का निवास नहीं है, इस खाली पड़े हुए आकाश को अलोक कहते हैं । प्र० - लोकाकाश और श्लोकाकाश किन्हें कहते हैं ? उ०- लोक के आकाश को लोकाकाश और मलोक के प्रकाश को अलोकाकाश कहते हैं । प्र-जब सभी द्रव्य एक ही लोकाकान में रहते हैं तो सब एक क्यों नहीं हो जाते ? उ०- सभी अपने-अपने स्वभाव को नहीं छोड़ते, अतः एक कैसे हो सकते हैं ? प्र० - लोकाकाश बढ़ा है या अलोकाकाश ? उ०- अलोकाकाश बड़ा है । अलोकाकाश का अनन्त भाग लोकाकाश है ।
SR No.090157
Book TitleDravyasangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size1 MB
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