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________________ द्रव्य संग्रह प्र०-सुख किसे कहते हैं ? उ०-आल्हाद रूप बास्मा की परिणति को सुख कहते हैं। प्रा-दुःख किसे कहते हैं ? उ०-खेद रूप आत्मपरिणति को दुःख कहते हैं। प्र-आत्मा सुख-दुःख का भोगने वाला किस अपेक्षा से है ? ज०-व्यवहारनयापेक्षा । प्र०-शुद्ध ज्ञान और शुद्ध दर्शन कौन स हैं ? २० केवलज्ञान और केवलदर्शन शद्ध शान-दर्शन । प्र०-शव ज्ञान दर्शन किस जीव के पाया जाता है ? उ०-अरहन्त-केवलो व सिद्धों में शुद्ध शान-दर्शन पाया जाता है। प्र०-आत्मा शुख शान दर्शन का भोगने वाला किस नय अपेक्षा स-निश्चयनय की अपेक्षा से । जीव स्वयह प्रमाण है अणुगुरुवेहपमाणो उपसंहारप्पसप्पदो चैदा। असमुहदो बवहारा णिज्चयणययो असंखदेसो वा ॥१०॥ मम्बया ( चेदा आरमा। ( ववहारा) व्यवहारनय से। (असमुहदो) समुद्रात को छोड़कर अन्य अवस्थाओं में। ( उवसंहारप्पसप्पदो) संकोच और विस्तार के कारण । ( अणुगुरुदेहपमाणो) छोटे-बड़े शरीर के बराबर प्रमाण को धारण करने वाला है। (वा) और( णिचयणयदो ) निश्चयनय से । ( असंलसो) असंख्यातप्रदेशी है । वर्ष आत्मा व्यवहारनय ये समुपात को छोड़कर अन्य अवस्थाओं में संकोच-विस्तार के कारण छोटे-बड़े शरीर के बराबर प्रमाग को पारण करने वाला है और निश्चयनय से असंख्यातप्रदेशी है।
SR No.090157
Book TitleDravyasangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size1 MB
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