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________________ 76 देव, शास्त्र और गुरु (4) आहार-उपकरण आदि का शोधन न करना-आहार, उपकरण, आवास आदि का विना शोधन किए सेवन करने से साधु मूलगुणों से पतित होकर पोलाश्रमण (खोखला या पतित साधु) होता है। (5) वञ्चनादि तथा आरम्भ-क्रियाएँ-ठगने वाला, दूसरों को पीड़ित करने वाला, मिथ्यादोषों को ग्रहण करने वाला, मारण आदि मन्त्र-शास्त्र अथवा हिंसा-पोषक शास्त्रों को पढ़ने वाला और आरम्भसहित साधु चिरकाल-दीक्षित होकर भी सेवनीय नहीं है। (6) विकथा तथा अधःकर्मादि-चर्या- रागादिवर्धक सांसारिक स्त्रीकथा (काम-कथा), राजकथा (राजाओं के युद्ध आदि की कथा), चोरकथा तथा भक्तकथा (भोजन-सम्बंधी कथा) इन चार विकथाओं अथवा इसी प्रकार की अन्य लौकिक विकथाओं अर्थ कथा, वैर कथा, मूर्ख कथा, परिग्रह कथा, कृषिकथा आदि विकथाओं तथा अधःकर्मदोष (महादोष = निम्नदोष ऐसे आहार, वसति आदि को स्वीकार करना जिसके उत्पादन में छह काय के जीवों की हिंसा हो) से साधु को विरत रहना चाहिए। (7) पिशुनता, हास्यादि-पैशुन्य, हास्य, मत्सर, माया आदि करने से साधु नग्न होकर भी अपयश का पात्र होता है। (8) नृत्यादि-नृत्य करना, गाना, बाजा-बाजाना, बहुमान से गर्वयुक्त होकर निरन्तर कलह करना, वाद-विवाद करना, जुआ खेलना, कन्दर्पादि भावनाओं में निमग्न रहना, भोजन में रसगृद्धि होना, मायाचारी करना, व्यभिचार करना, ईर्यापथ को सोधे बिना दौड़ते हुए या उछलते हुए चलना, गिर पड़ना, पुनः उठकर दौड़ना, महिलाओं में राग करना, दूसरों में दोष निकालना, गृहस्थों 1. पिंडोवधिसेज्जाओ अविसोधिय जो य भुंजदे समणो। मूलट्ठाणं पत्तो भुवणेसु हवे समणपोल्लो। - मू०आ० 118 2. दंभं परपरिवादं पिसुणत्तण पावसुत्त-पडिसेवं। चिरपव्वइर्दपि मुणी आरंभजुर्द ण सेवेज्ज।। -मू०आ० 959 3. मू०आ० 855-856; गो०जी०, जी० प्र० 44/84/17, नि०सा०,ता. वृ० 67 / 4. विकहाइ विप्पमुक्को आहाकम्माइविरहीओ णाणी।। -रयणसार 100 5. अयसाण भायणेण य किं ते णग्गेण पावमलिणेण। पेसुण्णहासमच्छरमायाबहुलेण सवणेण।। -भा०पा०६९ तृतीय अध्याय : गुरु (साधु) ওও एवं शिष्यों पर स्नेह करना, स्त्रियों पर विश्वास करके उन्हें दर्शन-ज्ञान-चारित्र प्रदान करना (क्योंकि साधु को इनसे दूर रहना चाहिए) आदि। इन कार्यों को करने वाला साधु पार्श्वस्थ (दुष्टसाधु) है, दर्शन-ज्ञान से हीन है तथा तिर्यञ्च या नरक गति का पात्र है। (9) वैयावृत्यादि करते समय असावधानी- वैयावृत्य आदि शुभक्रियाओं को करते हुए षट्काय के जीवों को बाधा नहीं पहुँचानी चाहिए। अतएव वैयावृत्यादि शुभक्रियाओं के करते समय समितियों का ध्यान रखकर सावधानी वर्तनी चाहिए, असावधानी नहीं। . (10) अधिक शुभोपयोगी-क्रियायें- शुभोपयोगी-क्रियाओं में अधिक प्रवृत्ति करना साधु को उचित नहीं है, क्योंकि वैयावृत्यादि शुभ-कार्य गृहस्थों के प्रधान-कार्य हैं तथा साधुओं के गौण-कार्य। इसी प्रकार दान, पूजा, शील और उपवास-ये श्रावकों के धर्म हैं, क्योंकि ये धर्म जीवों की विराधना में भी कारण हैं। १.णच्चदि गायदि तावं वायं वाएदि लिंगरूवेण। सो पावमोहिदमदी तिरिक्खजोणी ण सो समणो।। 4 कलह वादं जूआ णिच्चा बहुमाणगविओ लिंगी। वच्चदि णरयं पाओ करमाणो लिंगिरूवेण।। 6 कंदप्पाइय वट्टइ करमाणो भोयणेसु रसगिद्धि। मायी लिंग विवाइ तिरिक्खजोणी ण सो समणो।। 12 उप्पडदि पडदि धावदि पुढवीओ खणदि लिंगरूवेण। इरियावहधारतो तिरिक्खजोणी ण सो समणो।। 15 रागो करेदि णिच्चं महिलावग्गं परे वा दूसेइ। दंसण-णाणविहीणो तिरिक्खजोणी ण सो समणो।।१७ पव्वज्जहीणगहियं णेहि सासम्मि वट्टदे बहुसो। आयार-विणयहीणो तिरिक्खजोणी ण सो समणो।।१८ दंसणणाणचरित्ते महिलावग्गम्मि देहि वीसट्ठो। पासत्थ वि हु णियट्ठो भावविणट्ठो ण सो समणो।। -लिङ्गपाहुड 20 2. जदि कुणदि कायखेदं वेज्जावच्चस्थ मुज्जदो समणो। ण हवदि अगारी धम्मो सो सावयाणं से।। -प्र०सा० 250 3. वही, तथा देंखेंदाणं पूजा सीलमुववासो चेति चठव्विहो सावयधम्मो। एसो चउव्विहो वि छज्जीवविराहओ। -क०पा०, 1/1, 1/82/100/2
SR No.035321
Book TitleDev Shastra Aur Guru
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Jain
PublisherAkhil Bharatvarshiya Digambar Jain Vidwat Parishad
Publication Year1994
Total Pages101
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size61 MB
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