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________________ 79 ..3 78 देव, शास्त्र और गुरु (11) तण, वृक्ष, पत्रादि का छेदन- सब जीवों में दयाभाव को प्राप्त साधु पृथिवी पर विहार करते हुए भी किसी जीव को कभी भी कष्ट नहीं पहुँचाते। जैसे- माता सदा पत्र का हित चाहती है वैसे ही साध समस्त प्राणियों का हित चाहते हैं। अतएव वे तृण, वृक्ष, हरित, बल्कल, पत्ता, कोपल, कन्दमूल, फल, पुष्प, बीज आदि का घात (छेदन) न तो स्वयं करते हैं और न दूसरों से कराते हैं। साधु इन कार्यों का अनुमोदन भी नहीं करते हैं। (12) ज्योतिष, मन्त्र, तन्त्र, वैद्यकादि का उपयोग- ज्योतिष, मन्त्र, तन्त्र, वशीकरण, मारण, उच्चाटन, जल-अग्नि-विष स्तम्भन, विक्रियाकर्म, धन-धान्यग्रहण, वैद्यक आदि का प्रयोग यश अथवा आजीविका के लिए साधु को वर्जित है। दातार को मन्त्रादि का प्रयोग बताना मन्त्रोपजीविका दोष है। इसी प्रकार हस्तरेखा आदि देखकर भूत, भविष्य या वर्तमान का कथन करना भी साधु को त्याज्य है। (13) दुर्जनादि-संगति-दुर्जन, लौकिक-जन, तरुण-जन, स्त्री, पुंश्चली, नपुंसक, पशु आदि की संगति निषिद्ध है। आर्यिका से भी पांच से सात हाथ दूर रहना चाहिए। पार्श्वस्थ आदि भ्रष्टमुनियों से दूर रहना चाहिए। (14) सदोष-वसतिका-सेवन- वसतिका-सम्बन्धी दोषों से रहित स्थान का ही साधु को सेवन करना चाहिए। 1. वसुधम्मि वि विहरंता पीडं ण करेंति कस्सइ कयाइ। जीवेसु दयावण्णा माया जह पुत्तभंडेसु।। 800 तणरुक्खहरिदछेदण तयपत्तपवालकंदमूलाई। फलपुष्फबीयघादं ण करेति मुणी ण कारेति।। - मू०आ०८०३ २.जोइसविज्जामंतोपजीणं वा य वस्सववहारं। धणधण्णपडिग्गहणं समणाणं दूसणं होई।। -र०सार 109 वश्याकर्षणविद्वेषं मारणोच्चाटनं तथा।। जलानलविषस्तम्भो रसकर्म रसायनम्।। 4.50 इत्यादिविक्रियाकर्मरञ्जितैर्दुष्टचेष्टितैः। आत्मानमपि न ज्ञातं नष्ट लोकद्वयच्युतैः। - ज्ञाना० 4.55 / मन्त्रवैद्यकज्योतिष्कोपजीवी राजादिसेवकः संसक्तः।-चारित्रसार 144/11 3. भ० आ० 331-554, 1072-1084, प्र०सा०२६८, रयणसार 42 पंच छ सत्त हत्थे सूरी अज्झावगो य साधू या परिहरिऊणज्जाओ गवासणेणेव वंदंति।। -मू०आ० 195 4. देखें, वसतिका, पृ. 100 तृतीय अध्याय : गुरु (साधु) (15) सदोष आहार-सेवन- मात्रा से अधिक एवं पौष्टिक भोजन साधु को गृद्धतापूर्वक नहीं करना चाहिए। गृहस्थ के ऊपर भोजन का भार भी नहीं डालना चाहिए। उद्गमादि भोजनसम्बन्धी दोषों से रहित ही भोजन लेना चाहिए।' (16) भिक्षाचर्या के नियमों को अनदेखा करना- भिक्षार्थ वृत्ति करते समय साधु को गृहस्थ के घर में अभिमत स्थान से आगे नहीं जाना चाहिए। छिद्रों से झांककर नहीं देखना चाहिए। अति-तंग और अन्धकारयुक्त प्रदेश में प्रवेश नहीं करना चाहिए। व्यस्त तथा शोकाकुल घर में, विवाहस्थल में, यज्ञशाला में तथा बहुजनसंसक्त प्रदेश में भी प्रवेश नहीं करना चाहिए। विधर्मी, नीचकुलीन, अतिदरिद्री, राजा, अति-धनाढ्य आदि के घर का आहार ग्रहण नहीं करना चाहिए। (17) स्वच्छन्द और एकल विहार- इस पंचम काल में स्वच्छन्द और अकेले विहार नहीं करना चाहिए। (18) लौकिक-क्रियाएँ- मोह से अथवा प्रमाद से साधु को लौकिकक्रियाओं में रुचि नहीं लेनी चाहिए क्योंकि ऐसा करने से वह अन्तरङ्ग व्रतों से च्युत हो जाता है। साधु के लिए ये कुछ निषिद्ध कार्य गिनाए गए हैं। इसी प्रकार अन्य निषिद्धकार्यों की भी कल्पना कर लेनी चाहिए। वस्तुतः साधु के लिए वे सभी कार्य निषिद्ध हैं जिनका हिंसादि से सम्बन्ध हो तथा जो कार्य सांसारिक-विषयों में आसक्तिजनक हों, वीतरागता में प्रतिबन्धक हों, यश आदि की लालसापूर्ति हेतु किए गए हों। मिथ्यादृष्टि (द्रव्यलिङ्गी) सदोष साधु जो साधु मर्यादानुकूल आचरण न करके स्वच्छन्द आचरण करते हैं, आर्तध्यान में लीन रहते हैं, मूर्ख होकर भी अपने को पण्डित मानते हैं, रागी हैं, व्रतहीन हैं तथा शरीरादि के पोषण में प्रवृत्त रहते हैं उन्हें सदोषसाधु, दुष्टसाधु, 1. देंखे, आहार, पृ. 96 / 2. देखें, भिक्षाचर्या, पृ. 95 // 3. देखें, विहार, पृ. 103 / 4. देखें, पृ. 49, टि. 1
SR No.035321
Book TitleDev Shastra Aur Guru
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Jain
PublisherAkhil Bharatvarshiya Digambar Jain Vidwat Parishad
Publication Year1994
Total Pages101
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size61 MB
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