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________________ 24 देव, शास्त्र और गुरु सिद्धों में परस्पर अपेक्षाकृत भेद स्वरूपतः सिद्धों में कोई भेद नहीं है, परन्तु पूर्वकालिक क्षेत्र, काल, गति, लिङ्ग, तीर्थ, चारित्र, प्रत्येक-बोधित, बुद्ध-बोधित, ज्ञान, अवगाहना, अन्तर, संख्या और अल्पबहुत्व की अपेक्षा सिद्धों में उपचार से भेद बतलाया गया है। अर्हन्त और सिद्ध में कथंचिद् भेदाभेद सभी आठों कर्मों को नष्ट करने वाले सिद्ध होते हैं तथा चार घातिया कर्मों (मोहनीय,अन्तराय, दर्शनावरणीय और ज्ञानावरणीय) को नष्ट करने वाले अर्हन्त होते हैं। यही दोनों में भेद है। चार घातिया कर्मों के नष्ट हो जाने पर अर्हन्तों में आत्मा के सभी गुण प्रकट हो जाते हैं। अतः अर्हन्त और सिद्ध परमेष्ठियों में गुणकृत भेद नहीं है। अर्हन्तों के अवशिष्ट अघातिया कर्म (वेदनीय, आयुः, नाम और गोत्र) जो शरीर से सम्बन्ध रखते हैं, आत्मगुणों का घात नहीं करते हैं। आयु:कर्म के शेष रहने के कारण उन्हें संसार में रहना पड़ता है परन्तु उन्हें सांसारिक दुःख नहीं होते हैं। सिद्धों की अपेक्षा अर्हन्तों को णमोकार मन्त्र में पहले नमस्कार इसलिए किया है, क्योंकि उनके उपदेश से ही हमें धर्म का स्वरूप ज्ञात होता है। उन दोनों में सलेपत्व (अर्हन्त), निलेपत्व (सिद्ध) तथा देश-भेदादि की अपेक्षा भेद है। प्रथम अध्याय : देव (अर्हन्त-सिद्ध) 25 उपसंहार इस तरह सच्चे देव (परमात्मा) वही हैं जिन्होंने अपने वीतरागी भाव से चारों घातिया कर्मों अथवा घातिया और अघातिया समस्त आवरक कर्मों का क्षय करके शुद्ध आत्मारूप को प्राप्त कर लिया है। वीतरागी होने से ही वे पूज्य हैं तथा आदर्श हैं। ऐसे वीतरागी देव मुख्यरूप से दो प्रकार के हैं (1) अर्हन्त (सशरीरी, जीवन्मुक्त)- जिन्होंने चारों धातिया कर्मों का तो पूर्णतः क्षय कर दिया है परन्तु आयुकर्म शेष रहने के कारण चारों अघातिया कों का क्षय नहीं किया है। आयु: की पूर्णता होते ही जो इसी जन्म में अवशिष्ट सभी अघातिया कर्मों का नियम से क्षय करेंगे ऐसे 'भावमोक्ष' वाले जीव सच्चे देव हैं। इनसे ही हमें धर्मोपदेश प्राप्त होता है। अतएव णमोकार मंत्र में णमो अरिहंताणं कहकर सर्वप्रथम इन्हीं को नमस्कार किया गया है। यद्यपि ये अभी संसार में हैं परन्तु इन्हें सांसारिक कोई बाधा नहीं है। ये अपेक्षाभेद से तीर्थङ्कर, मूक-केवली आदि भेद वाले होते हैं परन्तु अनन्त-चतुष्टय से सभी सम्पन्न हैं। ये परम-औदारिक शरीर वाले होते हैं। इनकी अकालमृत्यु नहीं होती। भोजन आदि नहीं करते। नख, केश नहीं बढ़ते। पसीना, मल, मूत्र आदि मल भी नहीं होता। (2) सिद्ध (विदेहमुक्त)- आठों कमों के क्षय से जब शरीर भी नहीं रहता तो उसे सिद्धावस्था कहते हैं। ये ऊर्ध्वलोक में लोकाय में पुरुषाकार छायारूप में स्थित हैं। इनका पुनः संसार में आगमन नहीं होता है। इनकी अवगाहना चरमशरीर से कुछ कम होती है। 'णमो सिद्धाणं' कहकर इन्हीं को नमस्कार किया गया है। ये सच्चे परमदेव हैं। इस अवस्था को संसारी भव्यजीव वीतरागभाव की साधना से प्राप्त कर सकते हैं। इनकी आराधना से संसार के प्राणियों को मार्गदर्शन मिलता है। यदि संसार के प्राणी इनके अनुसार आचरण करते हैं तो वे भी कर्मक्षय करके सच्चे देव बन जाते हैं। इस तरह जैनधर्म में स्वीकृत आराध्यदेव साक्षात् कृपा आदि न करते हुए भी जगत् के लिए परमकल्याणकारी हैं। इनके अतिरिक्त जो देवगति के देव हैं वे संसारी जीव हैं और कर्मों से आवृत्त हैं। देवगति के देवों में लौकान्तिक, सर्वार्थसिद्धि आदि के कुछ वैमानिक देव तो सम्यग्दृष्टि होने से मोक्षगामी हैं। परन्तु भवनवासी, व्यन्तर और ज्योतिष्क देव और देवियाँ मिथ्यादृष्टि होने से सर्वथा अपूज्य हैं। अतः कल्याणार्थी को क्षेत्रपालादि देवों और पद्मावती आदि देवियों की जिनेन्द्रदेववत् पूजा नहीं करनी जाहिए। ये देव और देवियाँ इन्द्र के परिचारक-परिचारिकाएँ है जो इन्द्र के 1. क्षेत्रकालगतिलिङ्गतीर्थचारित्रप्रत्येकबुद्धबोधितज्ञानावगाहनान्तरसंख्याल्पबहुत्वतः साध्याः। -त०सू० 10.9 2. सिद्धानामर्हतां च को भेद इति चेत्र, नष्टाष्टकर्माणः सिद्धाः नष्टघातिकर्माणोऽर्हन्त इति तयोर्भेदः। नष्टेषु घातिकर्मस्वाविर्भूताशेषात्मगुणत्वान गुणकृतस्तयोर्भेद इति चेन्न, अघातिकर्मोदयसत्त्वोपलम्भात्। तानि शुक्लध्यानाग्निनार्धदग्धत्वात्सन्त्यपि न स्वकार्यकतृणीति चेत्र, पिण्डनिपाताभावान्यथानुपपत्तितः आयुष्यादिशेषकर्मोदयास्तित्वसिद्धेः। तत्कार्यस्य चतुरशीतिलक्षयोन्यात्मकस्य जातिजरामरणोपलक्षितस्य संसारस्यासत्त्वात्तेषामात्मगुणघातनसामर्थ्याभावाच्च न तयोर्गुणकृतो भेद इति चेत्र, आयुष्य-वेदनीयोदययोर्जीवोर्ध्वगमनसुखप्रतिबन्धकयोः सत्वात्। नोर्ध्वगमनमात्मगुणस्तदभावे चात्मनो विनाशप्रसङ्गात्। सुखमपि न गुणस्तत एव। न वेदनीयोदयो दुःखजनकः केवलिनि केवलित्वान्यथानुपपत्तेरिति चेदस्त्वेवमेव न्यायप्राप्तत्वात्। किन्तु सलेपनिलेपत्वाभ्यां देशभेदाच्च तयोर्भेद इति सिद्धम्। -ध०, 1/1.1.1/46/2.
SR No.035321
Book TitleDev Shastra Aur Guru
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Jain
PublisherAkhil Bharatvarshiya Digambar Jain Vidwat Parishad
Publication Year1994
Total Pages101
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size61 MB
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