SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 20
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ प्रथम अध्याय : देव (अर्हन्त-सिद्ध) पुरुषाकार छायावत् अथवा मोमरहितमूषक के आकार की तरह होते हैं तथा लोक के शिखर पर स्थित होते हैं। मनुष्यलोकप्रमाण तनुवात के उपरिम भाग में सभी सिद्धों के सिर एक सदश होते हैं, परन्तु अधस्तन भाग में अवगाहना के हीनाधिक सम्भव होने से विसदृश भी होते हैं। एक ही क्षेत्र में कई सिद्ध रह सकते हैं, क्योंकि वे अरूपी हैं, सूक्ष्म हैं। अतएव वे किसी को रोकते भी नहीं हैं। सिद्धात्मा निश्चयनय से अपने में ही रहते हैं। देव, शास्त्र और गुरु राजवार्तिककार भावप्राणरूप ज्ञानदर्शनादि की अपेक्षा तथा रूढि की अपेक्षा सिद्धों में मुख्यजीवत्व नामक पारिणामिक भाव ही स्वीकार करते हैं।' सिद्धों की अवगाहना आदि आत्म-प्रदेशों में व्याप्त होकर रहने का नाम है 'अवगाहना' अर्थात् ऊंचाई-लम्बाई आदि आकार। सिद्धों की अवगाहना चरमशरीर से कुछ कम होती है। चरमशरीर की अवगाहना तीन प्रकार की सम्भव है- जघन्य, उत्कृष्ट और मध्यम। जघन्य अवगाहना कुछ कम साढ़े तीन अरलि, उत्कृष्ट अवगाहना 525 धनुष तथा मध्यम अवगाहना दोनों के मध्य की होने से अनेक भेद वाली है। नामकर्म के अभाव से शरीर के अनुसार होने वाला आत्मप्रदेशों का संकोचविस्तार नहीं होता है। अतः सिद्ध न अभावरूप हैं, न अणुरूप और न सर्वलोकव्यापी। शरीर न होने से शरीरकृत बाह्यप्रदेशों को कम करके पूर्वशरीर (चरमशरीर) से कुछ कम व्यापक सिद्धात्माओं को माना गया है। सिद्ध जीव 1. तथा सति सिद्धानामपि जीवत्वं सिद्धं जीवितपूर्वत्वात्। सम्प्रति न जीवन्ति सिद्धा भूतपूर्वगत्या जीवत्वमेषामौपचारिकत्वं मुख्यं चेष्यते, नैष दोषः, भावप्राणज्ञानदर्शनानुभवनात्, साम्प्रतिकमपि जीवत्वमस्ति। अथवा रूढिशब्दोऽयम्। रूढो वा क्रिया व्युत्पत्त्यर्थे वेति कादाचित्कं जीवनमपेक्ष्यं सर्वदा वर्तते गोशब्दवत्। -रा.वा. 1/4/7/25/27. 2. आत्मप्रदेशव्यापित्वमवगाहनम्। तद्विविधम् उत्कृष्टजधन्यभेदात् / तत्रोत्कृष्टं पशधनु: शतानि पञ्चविंशत्युत्तराणि। जघन्यमर्धचतुर्थारत्नयो देशोनाः। मध्ये विकल्पाः। एकस्मिन्नवगाहे सिद्ध्यति। -स०सि० 10.9/473/11 तथा देखिए, -रा.वा. 10.9/10/647/15 / / एकस्मिन्नवगाहे सिद्ध्यन्ति पूर्वभावप्रज्ञापन-नयापेक्षया। प्रत्युत्पन्नभावप्रज्ञापने तु एतस्मिन्नेव देशोने। -रा.वा. 10.9/10/647/19 किंचूणा चरम-देहदो सिद्धा।..... तत् किच्चिदूनत्वं शरीराङ्गोपाङ्गजनितनासिकादिछिद्राणा मपूर्णत्वे सति०। -द्रव्यसंग्रह, टीका 14/44/2 3. वही, स्यान्मतं, यदि शरीरानुविधायी जीवः तदभावात्स्वाभाविकलोकाकाश प्रदेशपरिमाणत्वात्तावद्विसर्पणं प्राप्नोतीति। नैषदोषः। कुतः? कारणाभावात्। नामकर्मसम्बन्धो हि संहरणविसर्पणकारणम् / तदभावात्पुनःसंहरणविसर्पणाभावः। -स०सि० 10.4/469/2 तथा देखिए, राजवार्तिक 10/4/12-13/643/27 अनाकारत्वान्मुक्तानामभाव इति चेत्र, अतीतानन्तशरीराकारत्वात्। -स०सि० 10/4/ 468/13. संसार में पुनरागमन आदि का अभाव जिस प्रकार बीज के पूर्णतया जल जाने पर उसमें पुनः अङ्कुर उत्पन्न नहीं होता उसी प्रकार कर्मरूपी बीज के दग्ध हो जाने पर संसाररूपी अङ्कर उत्पन्न नहीं होता। जगत् के प्रति करुणा आदि भी नहीं होती, क्योंकि वे वीतरागी हैं। गुरुत्व आदि न होने से उनके पतन की भी कोई सम्भावाना नहीं हैं। 1. जावद्धम्मं दत्वं तावं गंतूण लोयसिहरम्मि। चेट्ठन्ति सव्वसिद्धा पुह पुह गयसित्थमूसगब्भणिहा।। -ति०प०, 9/16. पुरिसायारो अप्पा सिद्धो झाएहि लोयसिहरत्थो। -द्र०सं०५१ ...गत सिक्थमूषाग कारवच्छायाप्रतिमावद्वा पुरुषाकारः। -वही, टीका माणुसलोयपमाणे संठिय तणुवादउवरिमे भागे। सरिसा सिरा सव्वाणं हेट्ठिमभागम्मि विसरिसा केई।। -ति०प०९/१५. २.लोकस्याग्रे व्यवहरणतः संस्थितो देवदेवः। स्वात्मन्युच्चैरविचलतया निश्चयेनैवमास्ते।। -नियमसार, ता००० 176 क 294 3. भंगविहीणो य भवो संभवपरिवज्जिदो विणासो हि। -प्र०सा० 17 पुनर्बन्धप्रसंगो जानता पश्यतश्च कारुण्यादिति चेत्, न, सर्वासवपरिक्षयात्।.... भक्तिस्नेहकृपास्पृहादीनां रागविकल्पत्वाद्वीतरागे न ते सन्तीति। अकस्मादिति चेत्, अनिर्मोक्षप्रसङगा ....मक्तिप्राप्त्यनन्तरमपि बन्धोपपत्तेः। स्थानवत्वात्पात इति चेत, न, अनास्त्रवत्वात्। आस्रवतो हि पानपात्रस्याधःपतनं दृश्यते, न चास्रवो मुक्तस्यास्ति। गौरवाभावाच्च। ..... यस्य हि स्थानवत्वं पातकारणं तस्य सर्वेषां पदार्थानां (आकाशादीनां) पातः स्यात् स्थानवत्त्वाविशेषात्। -राजवार्तिक 10/4/4-8/642-27. दग्धे बीजे यथाऽत्यन्तं प्रादुर्भवति नाकुः।। कर्मबीजे तथा दग्धे न रोहति भवाकुस।।-रा०वा०१०/२/३/६४१/६ पर उधृत। ण च ते संसारे णिविदं ति णट्ठासवत्तादो। -ध०४/१.५.३१०/४७७/५ सिज्झन्ति जत्तिया खलु इह संववहारजीवरासीओ। एंति अगाइवस्सइ रासीओ तित्तआ तम्मि।।२ इति वचनाद, यावन्तश्च यतो मुक्तिं गच्छन्ति जीवास्तावन्तोऽनादिनिगोदवनस्पतिराशेस्तत्रागच्छन्ति। -स्याद्वादमञ्जरी 29/331/13 पर उद्धृत।
SR No.035321
Book TitleDev Shastra Aur Guru
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Jain
PublisherAkhil Bharatvarshiya Digambar Jain Vidwat Parishad
Publication Year1994
Total Pages101
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size61 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy